तुगलकी फरमान का अर्थ | Tughlaqi Farman meaning in hindi

एक ऐसा आदेश जिसमें तर्क-वितर्क के लिए कोई स्थान न हो तथा जिसके सही या गलत होने की जाँच किए बगैर ही उसे लागू कर दिया जाए को तुगलकी फरमान कहा जाता है। तुगलकी फरमान का हिन्दी में मतलब होता है सख्त आदेश (इंग्लिश: स्ट्रिक्ट आर्डर)। तुगलकी फरमान को लोकतंत्र में एक कटाक्ष के तौर पर देखा जाता है जो कि लोकतंत्र के विरूद्ध होता है तथा जिसमें जनता की सहमति को तरजीह न देकर एक व्यक्ति या एक समूह की सहमति को श्रेष्ठ माना जाता है। विरोध की स्थिति में ऐसा फरमान सख्ती से लागू किया जाता है। तुगलकी फरमान शब्द चौदहवीं शताब्दी में दिल्ली की सल्तनत पर काबिज रहे मोहम्मद बिन तुगलक से जुड़ा है जिसके सख्त व एकतरफे फैसलों ने तुगलकी फरमान कहावत को जन्म दिया। मोहम्मद बिन तुगलक के दो फैसले तुगलकी फरमान कहावत के साथ जोड़े जाते हैं पहला अपनी राजधानी को दिल्ली से महाराष्ट्र के देवगिरि ले जाना तथा दिल्ली की जनता को भी देवगिरि स्थानांतरित होने पर विवश करना व दूसरा रातों-रात चाँदी के सिक्कों को बंद कर तांबे के सिक्कों को चलन में लाना। दोनों फरमान राजा के खिलाफ साबित हुए तथा उन्हें एक बड़ी जानमाल की हानि उठानी पड़ी क्योंकि महाराष्ट्र में पानी की किल्लत के चलते कुछ दिन बाद राजधानी को वापिस दिल्ली लाना पड़ा था जिस कारण लंबे रास्ते में पानी की कमी व बीमारी फैलने के कारण कुछ लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया तथा राजा को जनता की निराशा का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर तांबे के अधिकता व सरलता से मिल जाने के कारण के कारण तांबे के सिक्कों की नकल लोगों ने घर पर तैयार करनी शुरू कर दी जिस कारण यह फैसला बदल कर राजा को वापिस पुराने चाँदी के सिक्के चलाने पड़े फलस्वरूप नकल किए हुए तांबे के सिक्कों के बदले भी असली चाँदी के सिक्के देने पर राजा को मजबूर होना पड़ा। इन दोनों फैसलों के कारण राज्य को जान व राजस्व को माल की हानि हुई। तथा तब से इस प्रकार के एकतरफे व बिना विचार-विमर्श के दिए जाने वाले आदेशों को तुगलकी फरमान कहा जाने लगा।

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