माला फेरत जुग भया दोहे का अर्थ | Mala Ferat Jug Bhaya Meaning in Hindi

माला फेरत जुग भया: माला फेरते फेरते युग बिता दिए
फिरा न मन का फेर: लेकिन अब तक मन शांत नही हुआ
कर का मनका डार दे: हाथ का मनका छोड़ दे
मन का मनका फेर: मन की माला फेरना शुरू कर

इस दोहे में कबीर जी कहते हैं कि भगवान का नाम लेते लेते, माला जपते-जपतेे तुमने युगों-युग बिता दिए। सारा जीवन तुमने माला के मनके घूमाने में लगा दिया। लेकिन अब तक तुम्हे अपने मन की शांति की प्राप्ति नहीं हुई। जिस मन की शांति के लिए तुम सदा भगवान की माला जपते रहते हो वह शांति तुम्हें आज तक नहीं मिली इसलिए इस हाथ में पकड़े मनके को जिसे तुम माला में डालकर घुमा रहे हो इन्हें छोड़ कर अपने मन के मनको का ध्यान करो। अपने मन को शुद्ध करो, अपने विचार में शुद्धता लाओ तभी तुम्हें मन की शांति की प्राप्त होगी।

व्याख्या: सिर्फ भगवान की स्तुति करना या माला जपते रहने से मन शांत हो जाएगा ऐसा सोचना गलत है। क्योंकि मन की शांति तभी मिलती है जब इंसान कर्म अच्छे करें और अपने मन और विचारों में शुद्धता लाए। किसी के भी प्रति ईर्ष्या की भावना न रखे। आज जिस जीवन में हम जी रहे हैं वहां पर सबसे कठिन कार्य है मन की शांति लाना और यह मन की शांति तभी आ सकती है जब मनुष्य का मन उसके नियंत्रण में हो। मनुष्य को अपने मन को नियंत्रण में रखना चाहिए। मन पर नियंत्रण होगा तो विचारों पर नियंत्रण होगा और विचारों पर नियंत्रण होने से ही हमें मन की शांति का अनुभव होगा। इसलिए भगवान की स्तुति अपनी जगह है और वह तब तक तुम्हारे काम नहीं आएगी जब तक तुम्हारा मन शुद्ध नहीं होगा। इसलिए हाथ में पकड़ीे माला फेरने से अच्छा है कि अपने मन को नियंत्रित करो और मन की माला फेरो।

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