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अनुच्छेद 30 का अर्थ | Article 30 Meaning in Hindi

हाल ही में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 का यह बात कहते हुए विरोध किया जा रहा है कि यह अनुच्छेद हिन्दू धर्म ग्रन्थों को शिक्षण संस्थानों में पढ़ाए जाने से रोकता है और वहीं अन्य धर्मों (जो कि अल्पसंख्यक श्रेणी में सूचीबद्ध हैं) को अपना धार्मिक साहित्य पढ़ाने हेतु प्रोत्साहित करता है।

इसी तथ्य को आधार बनाते हुए सोशल मीडिया पर अनुच्छेद 30 का लगातार विरोध किया जा रहा है तथा इसे हटाए जाने की माँग की जा रही है। तो चलिए जानते हैं भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद वास्तव में क्या कहता है।

दरअसल 12 से 35 तक के सभी अनुच्छेद भारतीय संविधान के भाग 3 "मूलभूत अधिकार" का हिस्सा हैं। इसलिए अनुच्छेद 30 भी मूलभूत अधिकारों के दायरे में आता है। अनुच्छेद 30 का शीर्षक है (शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक-वर्गों का अधिकार)

अनुच्छेद 30 दो खंडों से मिलकर बना है इस अनुच्छेद का खंड (1) कहता है :

(1) धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

इसके बाद इस अनुच्छेद का (1क) कहता है :

[(1क) खंड (1) में निर्दिष्ट किसी अल्पसंख्यक-वर्ग द्वारा स्थापित और प्रशासित शिक्षा संस्था की संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधि बनाते समय, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी संपत्ति के अर्जन के लिए ऐसी विधि द्वारा नियत या उसके अधीन अवधारित रकम इतनी हो कि उस खंड के अधीन प्रत्याभूत अधिकार निर्बन्धित या निराकृत न हो जाए।]

इसके बाद अनुच्छेद 30 का खण्ड (2) कहता है :

शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंध में है।

इस अनुच्छेद की लिखित सरंचना में स्पष्ट है कि यह अनुच्छेद समानता को ध्यान में रखते हुए अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

साथ ही धर्म और भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति के अनुसार शिक्षा संस्था स्थापित करने व उनका स्वतंत्र रूप से प्रबंधन करने का संवैधानिक अधिकार भी देता है और किसी संस्था का सरकार द्वारा अधिग्रहण किए जाने के मामले में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को नाममात्र भी हानि न पहुँचाने की बात स्पष्ट करता है।

इसके अलावा अनुच्छेद 30 यह भी सुनिश्चित करता है कि शैक्षणिक संस्थाओं को मिलने वाली सरकारी सहायता में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो सके।

यद्द्पि उपरोक्त सभी तथ्य अनुच्छेद 30 के पक्ष में जाते हैं लेकिन ये ही तथ्य इसके विरोध का कारण भी हैं।

दरअसल अनुच्छेद 30 से मिली स्वतंत्रता के आधार पर अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित की गई शैक्षिण संस्था पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने हेतु बाध्य नही हैं जो कि पिछड़े वर्गों के अधिकारों का हनन है।

और क्योंकि ये संस्थाएं सरकारी हस्तक्षेप से पूर्णतः स्वतंत्र हैं इसलिए इनके आंतरिक मामलों में होने वाले भ्र्ष्टाचार के मामले में सरकार को मूकदर्शक बनना पड़ता है।

इसके अलावा गैर-अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों में (हिन्दू शैक्षणिक संस्थान) सरकार को हस्तक्षेप करने की छूट है लेकिन अल्पसंख्यकों के शिक्षा संस्थानों में वह हस्तक्षेप नही कर सकती। यह बिंदु गैर-अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक क्षेत्र में मिलने वाले समान अधिकारों से वंचित करता है। यही कारण है कि अनुच्छेद 30 को समय-समय पर आलोचना व विरोध का सामना करना पड़ता है।

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