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नस्लवाद का अर्थ | Racism Meaning in Hindi

दोस्तों मौजूदा समय में दुनिया में 7 अरब से अधिक लोग रहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति के आसपास का माहौल अलग होता है। एक जैसे भौगोलिक वातावरण में रहते हुए हमारे अंदर कुछ समानताएं आ जाती है वहीं अलग-अलग भौगोलिक वातावरण में रहते हुए हमारे अंदर कुछ असमानताएं भी आ जाती हैं। जैसे कि त्वचा का रंग, शरीर का कद, मुख की बनावट, बालों की बनावट और रंग तथा नाक की बनावट इत्यादि।

पृथ्वी के कुछ स्थानों का भौगोलिक वातावरण इतना अलग होता है कि इनमें रहने वाले लोगों में भारी असमानता दिखाई देने लगती है जैसे अफ्रीकी लोगों का रंग काला होता है तो वहीं यूरोपीय लोगों का रंग सफेद होता है।

इन्ही असमानताओं के आधार पर मनुष्य की प्रजातियों को नस्लों में बांट दिया जाता है किंतु यहाँ यह बात याद रखी जाती है कि देखने मात्र में अलग दिखने वाले सभी मनुष्य मूल रूप से समान हैं मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली भावनाएं व संवेदनाएंं तथा उन्हें अभिव्यक्त करने की क्षमता जहाँ हमें अन्य जीवों से अलग बनाती हैं वहीं आपस में सभी मनुष्यों को जोड़ती भी हैं।

लेकिन समय बीतने के साथ-साथ कुछ सामाजिक घटनाएं ऐसी घट जाती हैं जो मनुष्य की आभासी प्रजातियों के बीच की खाई को गहरा कर देती हैं और यहीं से रेसिज्म अर्थात नस्लवाद जन्म लेता है।

उदाहरण के तौर पर मानव स्वभाव ऐसा है कि वह एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है जिस कारण बहुत बार मनुष्यों के समूहों में संघर्ष होता है और उस संघर्ष में तकत्कालीन परिस्थितियों के चलते जो मानवीय नस्ल जीत जाती है वो खुद को दूसरे से बेहतर मानने लगती है और दूसरी को निम्नतर मानने लगती है।

और आगे चलकर दोनों नस्लों की पीढयों में यह बात घर कर जाती है कि वे एक दूसरे के बराबर नही हैं और यह विश्वास करने लगती हैं कि हर नस्ल के लोगों में कुछ खास खूबियां होती हैं, जो उसे दूसरी नस्लों से कमतर या बेहतर बनाती है और इसी विश्वास को हम नस्लवाद के रूप में देखते हैं यद्द्पि वैज्ञानिक रूप से यह स्पष्ट है कि मनुष्य की कोई भी प्रजाति कमतर नही है।

उदाहरण के तौर पर औपनिवेशिक ताकतों में गौरों का वर्चस्व था इसलिए उन्होंने स्वयं को श्रेष्ठतम दिखाने की भरपूर कोशिश की इसी का प्रभाव है कि आज भी हम किसी वैज्ञानिक तथ्य की पुष्टि को लेकर या किसी नए अविष्कार की आस में पश्चिम देशों की ओर झाँकते हैं।

हमारे देश के अंदर बात की जाए तो गोरा होने के लिए उपयोग होने वाले उत्पादों की बिक्री सदैव अपने चरम पर रहती है जो हमें काले लोगों के प्रति रेसिस्ट घोषित करती है। उत्तरी भारतीय और दक्षिणी भारतीयों के बीच नस्लभेदी विचारधारा बहुत बार सामने आती है यद्द्पि मिली जुली जनसँख्या होने के चलते हमारा देश कम से कम रंग के आधार पर भेदभाव करने से काफी हद तक बचा हुआ है। हालांकि जातिवाद का डंक हमें नस्लवाद से बचे होने का एहसास नही होने देता।

नस्लवाद को स्पष्ट रूप से देखना है तो अमेरिका इसका सबसे बेहतर उदाहरण रहेगा जहाँ पर अफ्रीकी मूल के अमेरिकियों के साथ पूरा तंत्र भेदभाव करता है। वहाँ की कॉलेज डिग्रियों से लेकर बैंकों द्वारा दिए जाने वाले लोन तक में काले लोगों के प्रति नस्लवाद साफ दिखाई देता है।

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