टिक बोर्न वायरस का अर्थ | Tick Borne Virus Meaning in Hindi

हाल ही में चीन में एक नए वायरस के मामले सामने आए यह एक टिक-बोर्न (टिक-जनित) वायरस है अर्थात इसका प्रसार टिक्स के काटने से होता है। टिक्स उन कीड़ों को कहा जाता है जो मवेशियों, भेड़-बकरियों इत्यादि की चमड़ी पर चिपक जाते हैं और खून चूसते हैं। ग्रामीण इलाकों में इन्हें किलनी, कुटकी या चिचड़ी इत्यादि नाम से जाना जाता है। इस टिक जनित वायरस के चलते चीन में 07 लोगों की मौत हो चुकी है वहीं 60 लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। इस वायरस का संक्रमण चीन के जियांगसू और अनहुई प्रांत में तेजी से फैल रहा है। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि यह नया वायरस क्या है; मनुष्यों में कैसे फैलता है; इससे होने वाली बीमारी क्या है, इससे ग्रसित होने वाले रोगियों में कौन से लक्षण देखे जाते हैं तथा यह वायरस अन्य देशों के लिए कितना खतरनाक है।

दरअसल टिक्स के काटने से पशुओं से होते हुए इंसानों में SFTS नामक वायरस फैल रहा है।

SFTS का पूरा नाम है Severe Fever With Thrombocytopenia Syndrome (अर्थात  तेज बुखार के साथ थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम बीमारी)

यह वायरस Bunyavirus श्रेणी से संबंधित है तथा Haemaphysalis longicornis नामक टिक के जरिए फैल रहा है जो कि आम तौर पर एशिया, अमेरिका, अफ्रीका तथा मेडिटेरियन क्षेत्र में पाया जाता है। इंसानों तक यह वायरस संक्रमित जानवर द्वारा काटे जाने, संक्रमित रक्त, बलगम, पसीने या घाव के संपर्क में आने से फैलता है।

थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम गंभीर बुखार के साथ होने वाली एक संक्रामक बीमारी है। यह बीमारी SFTS वायरस के कारण होती है। इससे जुड़े मामले पहली बार वर्ष 2009 में चीन के हुबेई और हेनान प्रांतों के ग्रामीण इलाकों में पाए गए थे। इस बीमारी में मृत्यु दर 16% से लेकर 30% है। इतनी ज्यादा मृत्यु दर होने के कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस बीमारी को 10 सबसे अधिक प्राथमिकता वाली बीमारियों में सूचीबद्ध किया है।

टिक जनित STFS वायरस से होने वाली इस बीमारी के प्रमुख ​​लक्षणों में गंभीर बुखार, उल्टी, दस्त, सर्दी लगना, सिर दर्द, अंगों की विफलता, पेट दर्द, मसूड़ों से रक्त बहना, थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट्स की सँख्या कम होना), ल्यूकोपेनिया (श्वेत रक्त कोशिकाओं की सँख्या कम होना) इत्यादि शामिल है।

इस वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड 07 से 13 दिन का है। अर्थात SFTS वायरस से संक्रमित होने पर इसके लक्षण उभरने में 07 से 13 दिन का समय लगता है।

टिक्स कीड़ों का जीवनकाल अमूमन 03 वर्षों का होता है तथा यह खून पीकर ही जीवित रहते हैं इसलिए जब यह मवेशियों या भेड़-बकरियों इत्यादि को काटते हैं तो उन्हें SFTS वायरस से संक्रमित कर देते हैं।

इन पशुओं के संपर्क में रहने वाले किसान, पशु पालक तथा शिकारी इस वायरस की चपेट में आ जाते हैं; और इस तरह यह वायरस इंसानों तक पहुँचता है।

इस वायरस के इलाज हेतु अभी तक कोई टिका विकसित नही किया जा सका है हालांकि इसके इलाज में Ribavirin (राइबावाईरिन) नामक एंटीवायरल दवा सहायक है।

फिलहाल इस वायरस के मामले मुख्यतः चीन, दक्षिण कोरिया, जापान तथा वियतनाम में देखे गए हैं।

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