कल्याणकारी राज्य का अर्थ Kalyankari Rajya meaning in hindi


चाणक्य, अरस्तु और प्लेटो के काल से ही किसी भी देश के शासन को चलाने के लिए एक ऐसी शासन व्यवस्था की खोज करने की कोशिश की जाती रही है, जो लोगों का ज्यादा से ज्यादा भला कर सके और जिस व्यवस्था को ज्यादा से ज्यादा लोग अच्छा माने। अच्छे शासन की तलाश में बहुत सी विचारधाराएं आई जो शासन शक्ति को अलग-अलग हाथों में सौंपना चाहती थी, कुछ विचारधाराएं ऐसी आई जो शासन को समाज के हाथ में सौंप देना चाहती थी जैसे कि समाजवाद। तो कुछ विचारधाराएं ऐसी आई जिन्होंने राज्य यानी कि सरकार की आवश्यकता को ही नकार दिया, साम्यवाद और अराजकतावाद ऐसी ही विचारधाराएं रही हैं जो व्यक्ति के जीवन में राज्य की कोई आवश्यकता नहीं मानती। इनका मानना है कि यदि राज्य ही नही होगा तो व्यक्ति का शोषण ही नही होगा और वो सदैव सुखी रहेगा। तो वही फासीवाद और नाजीवाद जैसी विचारधाराओं ने यह सिद्ध करने की कोशिश की, कि राज्य अति आवश्यक है और इसका प्रत्येक व्यक्ति पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए, तभी कोई देश सफल हो सकता है तथा नागरिकों के जीवन में सुख और समृद्धि आ सकती है।

इन सब विचारों को पार करते हुए आज हम जिस सिद्धांत पर हम पहुंचे हैं तथा जो लोगों की खुशहाली में सबसे कारगर सिद्ध होता दिखाई देता है, वह है "लोक कल्याणकारी सिद्धांत" लोक कल्याणकारी सिद्धांत साम्यवाद और अराजकतावाद की तरह राज्य को अनावश्यक नहीं मानता, बल्कि उसके ऊपर लोगों का कल्याण करने की जिम्मेदारी डाल देना चाहता है। लोक कल्याणकारी सिद्धांत कहता है कि राज्य एक आवश्यक व अनिवार्य संघ है, लेकिन इसका लक्ष्य "पुलिस राज्य" की तरह कानून व्यवस्था बनाने तक ही सीमित नही होना चाहिए, बल्कि इसका अंतिम लक्ष्य सभी नागरिको के जीवन को सुखी बनाना होना चाहिए, अंतिम व्यक्ति भी राज्य की शासन व्यवस्था में खुश रहे तथा निरंतर विकास करता रहे इस तरह से राज्य को शासन करना चाहिए।

लोक कल्याण का यह सिद्धांत इतना लोकप्रिय हुआ कि आज विश्व के अधिकांश राज्यों तथा उनकी पूरी व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य लोक कल्याण हो गया है और इनकी लोक कल्याणकारी प्रवृति के कारण ही इन्हें "कल्याणकारी राज्य" कहा जाता है।

19वीं शताब्दी तक दुनिया के ज्यादातर देशों में "पुलिस राज्य" की धारणा काम करती थी, पुलिस राज्य एक ऐसा राज्य होता है, जहां पर सरकार अपने आपको केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित रखती है तथा लोक कल्याण का दायित्व व्यक्तियों पर छोड़ देती है, लेकिन पुलिस राज्य की अवधारणा के बावजूद भी हमने देखा कि उन राज्यों ने भी निरंतर लोक कल्याण के लिए बहुत से कार्य किए, जिन्होंने किसी न किसी रूप में कल्याणकारी राज्य की उत्पत्ति में सहायता की है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि इंग्लैंड में सबसे पहले रानी एलिजाबेथ ने गरीबी कानून पारित किया जिसके तहत गरीबों, अपाहिजों व अनाथों की सेवा तथा पालन पोषण पर विशेष ध्यान दिया गया। इस तरह का कानून सर्वप्रथम इंग्लैंड में आने से स्पष्ट होता है कि कल्याणकारी राज्य की शुरुआत इंग्लैंड से हुई है।

हालांकि यूरोप के अन्य देशों में भी इसके बीज दिखाई देते हैं, नेपोलियन ने फ्रांस के नागरिकों को खुश करने के लिए सार्वजनिक मताधिकार, मजदूर संघ, मजदूरी में वृद्धि तथा बीमा योजनाएं चलाई थी, जो लोक कल्याण के अंतर्गत आती हैं। तो वहीं जर्मनी में बिस्मार्क ने बीमारी, दुर्घटना व बुढ़ापा संबंधी बीमा योजनाए चलाई तथा सामाजिक सुरक्षा संबंधी नीतियां बनाई जिन्होंने जर्मनी में लोक कल्याण की भावना का विकास किया। अमेरिका में शुरुआती तौर पर लोक कल्याणकारी नीतियों का विरोध किया गया, क्योंकि उनका मानना था कि ये नीतियां राज्य को दिवालिया बना देंगी। लेकिन इसके बावजूद वहां सामाजिक सुरक्षा, निशुल्क शिक्षा तथा वृद्धाश्रम के रूप में लोक कल्याणकारी योजनाएं चलाई गई।

भारत के संदर्भ में लोक कल्याणकारी राज्य की भावना का विकास देखा जाए तो, भारत में लोक कल्याण की प्रथा प्राचीन काल से ही प्रचलित रही है। लेकिन राज्य से संबंधित लोक कल्याण की भावना हमें ब्रिटिश काल से दिखाई देती है, जब सती प्रथा तथा बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाओं के विरोध में कदम उठाए गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारतीय संविधान की प्रस्तावना तथा नीति निर्देशक सिद्धांतों का मूलभूत उद्देश्य यही है कि भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाया जाए, इसके अंतर्गत भारत में जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त साधन, भौतिक साधनों का सार्वजनिक स्वामित्व, स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि, बेकारी, बुढ़ापा तथा अंग-भंग की स्थिति में सार्वजनिक सहायता, कुटीर उद्योगों का विकास, बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल व स्त्रियों से संबंधित कार्यक्रम इत्यादि यह सभी प्रावधान ऐसे हैं, जो भारत को एक कल्याणकारी राज्य की तरफ लेकर जाते हैं। इनमें ग्राम पंचायतों की स्थापना तथा बेरोजगारी दूर करने के उपाय भी शामिल है, इसके साथ ही बच्चों को दी जाने वाली निशुल्क शिक्षा भी भारत का एक कल्याणकारी राज्य की ओर बढ़ता कदम है।

कल्याणकारी राज्य के बारे में कुछ विद्वानों की परिभाषाएं हैं महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें हमें पढ़ना चाहिए, इनमें डॉ. अब्राहिम लिंकन ने कल्याणकारी राज्य की परिभाषा देते हुए कहा है कि "कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान वितरण के उद्देश्य से करता है" तो वहीं गारनर के अनुसार - कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य राष्ट्रीय जीवन, राष्ट्रीय धन तथा जीवन के भौतिक, बौद्धिक तथा नैतिक स्तर को विस्तृत करना है" कांट के शब्दों में "कल्याणकारी राज्य का अर्थ उस राज्य से है जो अपने नागरिकों के लिए अधिकतम सामाजिक सुविधाएं प्रदान करे"

कल्याणकारी राज्य की विशेषताओं के बारे में बात करें तो, इसकी सबसे पहली विशेषता यह है कि लोक कल्याण की भावना ही इसका मुख्य उत्तरदायित्व है, लोक कल्याण की भावना होने से तात्पर्य यह नहीं है कि राज्य जब लोग कल्याण संबंधी कार्य करता है, तो वह नागरिकों पर कोई उपकार करता है, बल्कि यह राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करें, क्योंकि इसी कार्य के लिए व्यक्ति ने उसे शासन सौंप हुआ है। इसलिए लोक कल्याण की भावना कल्याणकारी राज्य की प्रथम विशेषता होती है।

कल्याणकारी राज्य की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें सर्वांगीण विकास की भावना होती है, यह सभी नागरिकों को एक साथ लेकर चलने वाला होता है। कल्याणकारी राज्य इस तरह से कार्य नही करता कि एक व्यक्ति का भला करते हुए यह दूसरे व्यक्ति का अहित कर दे, या किसी एक समुदाय को महत्व दे और दूसरे को निम्न कोटि का समझे, बल्कि सभी नागरिकों का सर्वांगीण विकास हो यही भावना लेकर कल्याणकारी राज्य चलता है।

कल्याणकारी राज्य की तीसरी विशेषता आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा की भावना है। सामाजिक तौर पर यह किसी भी प्रकार की कुप्रथा का विरोध करता है तथा लोगों को सामाजिक स्तर पर समान अवसर प्रदान करता है। आर्थिक स्तर पर यह लोगों को एक समान आय के साधन, एक समान रोजगार प्राप्ति के अवसर तथा समान संपत्ति का अधिकार प्रदान करता है, तथा राजनीतिक स्तर पर यह सभी को सत्ता प्राप्ति के समान अवसर प्रदान करता है जिससे कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार राज्य का हिस्सा बनकर नागरिकों के विकास में सहयोग दे सकता है।

कल्याणकारी राज्य की चौथी विशेषता यह है कि यह दरिद्रता तथा अभाव का उन्मूलन करता है, यदि एक राज्य के शासन में नागरिकों में दरिद्रता तथा अभाव आदि की भावना आती है, तो ऐसा ऐसा कल्याणकारी राज्य कभी भी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं कर सकता, उसके लिए आवश्यक है कि वह ऐसे कार्य करें जिससे नागरिकों में दरिद्रता तथा अभाव की भावना ना आए।

कल्याणकारी राज्य की पांचवी तथा अंतिम विशेषता है कि यह अपने प्रत्येक नागरिक के जन्म से लेकर उसके संपूर्ण जीवन तक उसके सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेता है, पुलिस राज्य की तरह है यह केवल कानूनी व्यवस्था तक सीमित रहने की बजाय नगरियों के संपूर्ण जीवन को किस प्रकार से खुशहाल रखा जाए, इस उद्देश्य को केंद्र में रखकर शासन करता है।

कल्याणकारी राज्य की उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कुछ कार्य करता है, इसका सबसे पहला कार्य है प्रशासन तथा जनता के बीच की दूरी को कम करना, ताकि प्रशासन जनता हित में जो भी कार्य करता है वे जनता तक पहुंच सके। कल्याणकारी राज्य का दूसरा कार्य है सामाजिक न्याय देना, प्रत्येक देश के नागरिक समाज में रहते हैं इसलिए उनके बीच जाति, धर्म, वंश, लिंग, प्रजाति, रंग या नस्ल इत्यादि के आधार पर भेदभाव ना हो तथा सभी नागरिकों को सामाजिक न्याय मिले यह कल्याणकारी राज्य का दूसरा सबसे बड़ा कार्य है।

कल्याणकारी राज्य का तीसरा कार्य है सामाजिक नीतियां बनाना, इन नीतियों में आरक्षण नीति सर्वोच्च है तथा अन्य नीतियों में बाल नीति, आवास नीति, शिक्षा नीति एवं स्वास्थ्य नीति आदि प्रमुख हैं, जो सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। कल्याणकारी राज्य का चौथा कार्य है सामाजिक कानून बनाना तथा समाज में जो भी व्याप्त कुरीतियां है उन्हें पहचान कर, लगातार दूर करने का प्रयास करते रहना। भारत के संदर्भ में छुआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा, बाल श्रम, वेश्यावृत्ति तथा बंधुआ मजदूरी इत्यादि पर प्रभावी रोक लगाने में राज्य काफी हद तक सफल हुआ है, लेकिन लोक कल्याणकारी राज्य का इरी यहां समाप्त नही होता, उसका यह कर्तव्य होता है कि वह निरंतर इन कुरीतियों की पहचान कर उन्हें समाज से समाप्त करता रहे, क्योंकि समय के साथ नई कुरीतियां समाज में जन्म लेती रहती हैं।

कल्याणकारी राज्य का पांचवां कार्य है जन सहयोग प्राप्त करना, क्योंकि वह जिन भी नीतियों और योजनाओं का संचालन करता है उनकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि आमजन भी उसका सहयोग करें क्योंकि कल्याणकारी राज्य की योजनाओं की सफलता इस बात में है कि जनता व्यवहारिक रूप से उसके कार्यों में कितना योगदान कर रही है। कल्याणकारी राज्य का छठा कार्य है दुर्बल तथा भेदभाव के शिकार व्यक्तियों तक विकास को पहुंचाना तथा तथा उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का निरंतर प्रयास करना। इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि जब तक विकास देश के अंतिम नागरिक तक नहीं पहुंच जाता, तब तक यह उस दिशा में लगातार कार्य करता रहे।

कल्याणकारी राज्य का सातवां तथा अंतिम कार्य यह है कि यह अपनी सफलताओं का लगातार मूल्यांकन करता रहे तथा जो भी सार्वजनिक धन इसे प्राप्त होता है उसे सावधानीपूर्वक खर्च करें, इस धन का अधिक से अधिक प्रयोग व्यर्थ के खर्चों की बजाय जनता के हित में होना चाहिए।

यदि भारत के बारे में बात की जाए कि भारत ने एक कल्याणकारी राज्य के रूप में किस प्रकार से कार्य किए हैं, तो हम देख सकते हैं कि भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने नीति निदेशक सिद्धांतों के जरिए खुद को एक कल्याणकारी राज्य की ओर विकसित करने का लक्ष्य रखा हैम इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भारत में बहुत से ऐसे कार्य हुए हैं जो भारत को एक कल्याणकारी राज्य है के रूप में प्रदर्शित करते हैं इनमें पिछड़े, दीन-हीन, अक्षम, निशक्त तथा प्रताड़ित किए गए व्यक्तियों का विकास, पुनर्वास तथा सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। महिलाएं, बच्चे, नशेड़ी, वृद्ध, असहाय, आदिवासी तथा पिछड़ी जातियों के नागरिकों को सम्मान प्रदान करने के लिए सरकार लगातार कार्य कर रही है। इसके अलावा जो भी कानून भारत में बनाए जाते हैं उनके लिए दिशा-निर्देश संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों से लिए जा रहे हैं, तो वहीं श्रमिकों के हितों की रक्षा, महिलाओं व बच्चों को सहयोग देने तथा नियोगयिताग्रस्त लोगों को उच्च जीवन प्रदान करने के लिए भी बहुत सी योजनाएं भारत सरकार चला रही है। भारत में प्रत्येक समुदाय व वर्ग के लिए समान रूप से प्रयास किए जा रहे हैं इसमें कुटीर उद्योगों के विकास के साथ-साथ कृषि का विकास भी किया जा रहा है, पुरुष विकास ज साथ महिला के विकास पर भी उचित ध्यान दिया जा रहा है तथा दोनों के लिए समान वेतन की व्यवस्था की गई है, दोनों के लिए समान सामाजिक न्याय की व्यवस्था की गई है। सभी प्रकार के वर्गों को समाज में बराबरी दिलाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है तथा सभी शिशुओं को उचित प्रारंभिक स्वास्थ्य मिले इसके लिए अस्पतालों में निशुल्क सेवाएं चलाई जा रही हैं, तो वहीं सभी बच्चों को भरपूर पोषण मिले इसके लिए मिड डे मील जैसी व्यवस्था विद्यालयों में शुरू की गई है, साथ में कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए कानून बनाए गए हैं। साथ ही किसानों के लिए भी सरकार समय-समय पर सहायता उपलब्ध करवाती रही है, इसके साथ ही जातिगत व्यवस्था को तोड़ने के लिए भी सरकार ने कानून बना रही है जिसके अंतर्गत जाति प्रथा को तोड़ने के लिए सरकार इंटर-कास्ट मैरिज जैसी समाजिक पहलों को सार्वजनिक सहयोग दे रही है तथा शैक्षिक, राजनीतिक व आर्थिक समानता के लिए शिक्षा संस्थानों, सरकारी संस्थाओं तथा नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर रही है।

अंत में हम कह सकते हैं कि आधुनिक युग में अधिकतर सरकारें लोक कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित हैं, कल्याणकारी राज्य का विकास धीरे-धीरे हुआ है, इसने प्राचीन काल के पुलिस राज्य से खुद को कल्याणकारी राज्य में परिवर्तित किया है, तथा व्यक्ति विकास में लगातार अपना योगदान दिया है। लेकिन कल्याणकारी राज्य के उद्देश्य अनंत है इसलिए राज्य के साथ-साथ सभी नागरिकों का भी है कर्तव्य है कि वे इन उदेश्यों की पूर्ति में कल्याणकारी राज्य का सहयोग करते रहें। 

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