वैधानिक सत्ता का अर्थ Vaidhanik satta meaning in hindi

राजनीतिक सिद्धांत एक परिकल्पना और तथ्य ज्ञान है, जो राजनीति क्या है, से संबंधित है। यह राजनीतिक समस्याओं का अन्वेषण है डेविड हैल्ड कहते हैं कि राजनीतिक जीवन - विषयक संकल्पनाओं व सामान्यीकरणों का एक तंत्र है। जिसमें सरकार राज्य व समाज की प्रकृति, उद्देश्य व मुख्य अभिलक्षण विषयक तथा मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताएं विषयक विचार, कल्पनाएं एवं उक्तियां सम्मिलित होती हैं। यद्द्पि राजनीतिक सिद्धांत के विद्वानों द्वारा को सर्वसम्मत परिभाषा उपलब्ध नहीं है। उतने ही प्रकार के राजनीतिक सिद्धांत हैं जितने राजनीतिक सिद्धांत के विषय में लिखने वाले विद्वान हैं। राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान की एक शाखा है यह उन विचारों का समूह है, जिनके आधार पर राजनीतिक तथ्यों एवं राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप की व्याख्या किया जाना संभव है। किसी भी राजनीतिक घटना के व्यवहारिक निरीक्षण करने तथा उससे निष्कर्ष निकालने के लिए राजनीतिक सिद्धांत की आवश्यकता होती है। व्यवहारिक पक्ष के साथ राजनीतिक सिद्धांत का आदर्शात्मक पक्ष भी है।

मेयो के अनुसार राजनीतिक सिद्धांत के तीन पक्ष है -

1.  तथ्यात्मक - वर्णनात्मक

2. अनुभाविक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित सामान्य निष्कर्ष

3. नैतिक अव्यय

इस प्रकार राजनीतिक सिद्धांत आनुभाविक और आदर्शात्मक दोनों है।

वाबसी के अनुसार -

"राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान का एक अत्यंत अनियंत्रित उपक्षेत्र है"

मोरिस दुबर्जर के अनुसार -

"यह अवलोकन, प्रयोग और तुलना के परिणामोंको एकरस बनाता है तथा घटनाओं के समूह के अंतर्गत समझी व पहचानी जाने वलिसमग्रि को क्रमबद्ध व समन्वित ढंग से अभिव्यक्त करता है"

राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ Rajnitik siddhant meaning in hindi

राजनीतिक सिद्धांत एक परिकल्पना और तथ्य ज्ञान है, जो राजनीति क्या है, से संबंधित है। यह राजनीतिक समस्याओं का अन्वेषण है डेविड हैल्ड कहते हैं कि राजनीतिक जीवन - विषयक संकल्पनाओं व सामान्यीकरणों का एक तंत्र है। जिसमें सरकार राज्य व समाज की प्रकृति, उद्देश्य व मुख्य अभिलक्षण विषयक तथा मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताएं विषयक विचार, कल्पनाएं एवं उक्तियां सम्मिलित होती हैं। यद्द्पि राजनीतिक सिद्धांत के विद्वानों द्वारा को सर्वसम्मत परिभाषा उपलब्ध नहीं है। उतने ही प्रकार के राजनीतिक सिद्धांत हैं जितने राजनीतिक सिद्धांत के विषय में लिखने वाले विद्वान हैं। राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान की एक शाखा है यह उन विचारों का समूह है, जिनके आधार पर राजनीतिक तथ्यों एवं राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप की व्याख्या किया जाना संभव है। किसी भी राजनीतिक घटना के व्यवहारिक निरीक्षण करने तथा उससे निष्कर्ष निकालने के लिए राजनीतिक सिद्धांत की आवश्यकता होती है। व्यवहारिक पक्ष के साथ राजनीतिक सिद्धांत का आदर्शात्मक पक्ष भी है।

मेयो के अनुसार राजनीतिक सिद्धांत के तीन पक्ष है -

1.  तथ्यात्मक - वर्णनात्मक

2. अनुभाविक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित सामान्य निष्कर्ष

3. नैतिक अव्यय

इस प्रकार राजनीतिक सिद्धांत आनुभाविक और आदर्शात्मक दोनों है।

वाबसी के अनुसार -

"राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान का एक अत्यंत अनियंत्रित उपक्षेत्र है"

मोरिस दुबर्जर के अनुसार -

"यह अवलोकन, प्रयोग और तुलना के परिणामोंको एकरस बनाता है तथा घटनाओं के समूह के अंतर्गत समझी व पहचानी जाने वलिसमग्रि को क्रमबद्ध व समन्वित ढंग से अभिव्यक्त करता है"

राजनीति का अर्थ Rajniti meaning in hindi

राजनीति का इतिहास उतना ही पुराना है जितना राज्य का। राजनीति शब्द की उत्पत्ति भी वहीं से मानी जाती है जहां से राज्य की। वास्तव में राजनीति (यानी कि पॉलिटिक्स) ग्रीक शब्द पोलिस (Polis) से बना है जिसका अर्थ नगर-राज्य होता है। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे नगर-राज्य हुआ करते थे और जो व्यक्ति इन नगर-राज्य के कार्यों में हिस्सा लेते थे उन्हें नागरिक अधिकार प्राप्त थे। ग्रीक दार्शनिकों के अनुसार व्यक्ति अपना संपूर्ण विकास राज्य के अंदर रहकर ही कर सकता है तथा राजनीति इसमें अपरिहार्य भूमिका निभाती है।

राजनीति के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत है कुछ विद्वानों के अनुसार यह शक्ति के लिए संघर्ष से संबंधित पहलुओं का अध्ययन करने वाला विषय है तो कुछ के अनुसार यह राज्य और सरकार से संबंधित है।

कुछ प्रमुख विद्वानों ने राजनीति को परिभाषित करने की कोशिश की है जो इस प्रकार है -

मैक्स वेबर के अनुसार - "राजनीति का अर्थ, सत्ता में भागीदारी के लिए प्रयास करना या राज्यों के अंतर्गत सत्ता के विभाजन या राज्य के अंतर्गत समूहों के बीच राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करना है"

मारंग्येथू के अनुसार - "राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है"

कैटलिन के अनुसार - "राजनीति संगठित मानव समाज के राजनीतिक पक्षों का अध्ययन करती है"

याद रखने योग्य है कि यह आवश्यक नहीं है कि राजनीति केवल सरकार का विषय हो और ना ही यह आवश्यक है कि है राजनीति केवल नेताओं की गतिविधियों से संबंधित हो। राजनीति हर उस स्थिति के संदर्भ में मौजूद है जहां नेतृत्व की स्थिति हासिल करने या बनाए रखने के प्रयास में सत्ता की संरचना और संघर्ष विद्यमान है। इस अर्थ में, कोई भी कारोबारी यूनियनों की राजनीति के बारे में या विश्वविद्यालय की राजनीति के बारे में बोल सकता है। कोई 'यौन राजनीति' पर चर्चा कर सकता है जिसका अर्थ है महिलाओं पर पुरुषों का वर्चस्व या इस संबंध को बदलने की कोशिश। एक संकीर्ण अर्थ में, सब कुछ राजनीति है जो हमारे जीवन को प्रभावित करती है।

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि राजनीति राज्य और शासन सत्ता से जुड़े सभी प्रकार के क्रियाकलापों व गतिविधियों से संबंधित होती है तथा इसका सार एक ऐसी व्यवस्था को खोज लाना है जिसे लोग अच्छा मानते हैं। 

राज्य का अर्थ Rajya meaning in hindi

राज्य का परिचय

राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन का केंद्रीय बिंदु राज्य है। इस विज्ञान का संपूर्ण अध्ययन राज्य पर ही टिका हुआ है गार्नर ने तो यहां तक भी कहा है कि राजनीति विज्ञान का आरंभ और अंत राज्य से ही होता है तो वही आर जी गार्टन ने अपनी पुस्तक पॉलिटिकल साइंस में राजनीति विज्ञान की परिभाषा देते हुए कहा है कि राजनीतिक विज्ञान राज्य का विज्ञान है। तो इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि राज्य की का महत्व राजनीतिक विज्ञान के लिए कितना अधिक है राज्य के बिना राजनीतिक विज्ञान की कल्पना करना असंभव भी है और अधूरा भी। तो इस वीडियो में हम जानेंगे कि राज्य क्या होता है राज्य की परिभाषा क्या है।

राज्य की परिभाषा

स्पष्ट अर्थों में बात की जाए तो और राज्य चार अनिवार्य तत्वों से मिलकर बनी हुई एक इकाई है। इसमें जनसंख्या, निश्चित भूभाग, सरकार और संप्रभुता का होना अनिवार्य है। इन चारों तत्वों से मिलकर जिस भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक इकाई का निर्माण होता है उसे हम राज्य कहते हैं राज्य को इंग्लिश में स्टेट कहा जाता है।

भारत के संविधान के अनुसार राज्य

संविधान के नजरिए से देखा जाए तो भारत के संविधान में राज्य शब्द को तीन अर्थों में परिभाषित किया गया है सबसे पहले अर्थ में एक देश को राज्य कहा गया है जैसे भारत एक राज्य है, दूसरे अर्थ में प्रांतों को राज्य कहा गया है जैसे कि भारत के प्रांत मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार इत्यादि राज्य हैं। इस परिभाषा का प्रयोग हम सभी प्रचलित रूप में करते हैं। इसके अलावा तीसरे अर्थ में भारत की सम्पूर्ण शासन व्यवस्था को भी संविधान में राज्य कहकर संबोधित किया गया है। तो इस प्रकार भारत के संविधान के नजरिए से मुख्य रूप से तीन परिभाषाएं है राज्य की दी गई हैं।

राज्य शब्द का अनुचित प्रयोग

मौजूदा समय में राज्य शब्द का प्रयोग प्रांतों के लिए और सरकार के संदर्भ में किया जाता है। यानी कि हम जिस प्रकार अपने राज्यों पश्चिम बंगाल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश इत्यादि को राज्य कहते हैं यहां पर राज्य शब्द का प्रयोग गलत माना जाता है। ठीक ऐसे ही हम सरकार के लिए भी राज्य शब्द का प्रयोग करते हैं इन दोनों प्रयोगों को गलत माना जाता है। मुख्य रूप से यूरोपीय परिभाषा के अनुसार चार तत्वों से मिलकर बनी इकाई ही राज्य कहलाती है ये तत्व हैं जनसंख्या, निश्चित भूभाग, सरकार और संप्रभुता। इसलिए इस इकाई के अलावा अन्य किसी संस्था इत्यादि के लिए किया गया राज्य शब्द का प्रयोग । प्रयोग माना जाता है।

राज्य शब्द की उतपत्ति

राज्य को इंग्लिश में स्टेट कहा जाता है और स्टेट शब्द लैटिन भाषा के स्टेटस से बना है लैटिन भाषा के स्टेटस शब्द का अर्थ "अन्य से तुलना में उच्च" होता है। राज्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इटली के विद्वान मैकियावेली ने किया था।

राज्य की आवश्यकता

मौजूदा समय में हम जिस इकाई को राज्य कहते हैं उस राज्य का महत्व बहुत अधिक है। दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वह किसी ना किसी राज्य का नागरिक हो। वर्तमान विश्व में जो लोग किसी राज्य के नागरिक नहीं है उनके लिए अपना अस्तित्व बचाए रखना काफी कठिन होता है। मौजूदा समय में प्रत्येक राज्य की एक अंतरराष्ट्रीय वैधता होना भी अनिवार्य है अंतरराष्ट्रीय वैधता के साथ ही राज्य में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक सम्मानीय जीवन जीने के लिए आवश्यक व अनिवार्य अधिकारों को प्राप्त करता है।

राज्य की भारतीय अवधारणा

राजा के बारे में भारतीय अवधारणा की बात की जाए तो हमें स्पष्ट रूप से कोई सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध परिभाषा राज्य की नहीं मिलती लेकिन अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में राज्य के सात अंग गिनाए गए हैं जिनमें राजा, मंत्री, कोष, दुर्ग व सेना को शामिल किया गया है।

राज्य का वर्तमान स्वरूप

राज्य समय के साथ-साथ अपना स्वरूप बदलता रहा है मौजूदा स्वरूप में राज्य जिन स्वरूपों को पार कर पहुँचा है वे हैं आदिवासी राज्य, प्राच्य साम्राज्य, ग्रीक नगर राज्य, रोमन विश्व साम्राज्य, सामंती राज्य और आज आधुनिक राष्ट्र राज्य। राज्य के मौजूदा प्रचलित स्वरूप को राष्ट्र राज्य के रूप में जाना जाता है। वर्तमान के राष्ट्र-राज्य राष्ट्रीय चेतना की तीव्र भावना के उतपन्न होने से अस्तित्व में आए हैं।

राल्फ मिलिबैंड के अनुसार राज्य के तत्व

समाजशास्त्री राल्फ मिलिबैंड के अनुसार राज्य जिन तत्वों से मिलकर बना है वे हैं सरकार, प्रशासन, कार्यपालिका, सेना और पुलिस बल, न्यायपालिका, स्थानीय स्वशासन व प्रतिनिधि सभाएं। राल्फ ने उन सभी आवश्यक तत्वों का वर्णन किया है जो संसदीय लोकतांत्रिक गणराज्य में विद्यमान होते हैं। 

वैधीकरण का अर्थ Vaidhikaran meaning in hindi

सत्ता को वैध घोषित करने या बनाने की प्रक्रिया वैधीकरण कहलाती है। राजनीतिक विद्वान वैधता को राजनीति विज्ञान का मुख्य केंद्रीय विषय मानते हैं। वास्तव में, वैधता से हमारा तातपर्य उन विधियों से है, जिनके द्वारा सत्ताधारी अपनी सत्ता को उचित ठहराते हैं। वैधता सत्ता को परखने में सहायता प्रदान करती है। यह हमें बताती है कि सरकार या सत्ता संविधान के कानून के अनुसार कार्य कर रही है या नहीं। सरकार द्वारा बनाया गया का विधि संगत है या अवैध। यह वैधता द्वारा ही पता किया जा सकता है। सत्ता का कौन सा रूप उचित है, यह वैधता ही निर्धारित करती है। दूसरे शब्दों में, वैधता सत्ता शक्ति पर नियंत्रण रखने का एक कुशल साधन है।

मैक्स वेबर ने इस संबंध में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए सत्ता के तीन रूपों को उचित ठहराया है, ये रूप हैं -

1. पारंपरिक वर्चस्व - इसके अनुसार व्यक्ति को सत्ता-शक्ति वंशानुगत रूप में प्राप्त होती है। सत्ता सदैव सत्ताधारी या उसके परिवार के हाथों में विद्यमान रहती है। सत्ताधारी परंपरागत मान्यताओं, परंपराओं तथा रीति-रिवाजों के कानूनों के अनुसार शासन करता है।

2. करिश्माई विधि - इसके अंतर्गत व्यक्ति भले ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखता हो, किंतु उसमें विलक्षण योग्यता विद्यमान होने के कारण वह देश की शासन सत्ता का कार्यभार संभालता है। लोग उसकी विलक्षण योग्यता से प्रभावित होकर सहर्ष उसे अपना नेता स्वीकार कर लेते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं।

3. विधिक-तार्किकता - इस विधि के अनुसार व्यक्ति को सत्ता-शक्ति का अधिकार एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने के बाद दिया जाता है। पहले तर्क-वितर्क द्वारा व्यक्ति की योग्यता व कुशलता का परीक्षण किया जाता है और योग्य होने पर उसे एक निश्चित क्षेत्र का कार्यभार सौंप दिया जाता है, जिससे वह व्यक्ति उस क्षेत्र के अधिकारी के रूप में जाना जाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मैक्स वेबर के अनुसार वैधता के आधार पर सत्ताधारी के तीन रूप होते हैं जो राज्य के शासन को चलाने के लिए कुशल व उत्तम माने जाते हैं।

फासीवादी राज्य का अर्थ Fasivadi rajya meaning in hindi

एक ऐसा देश जो शासन चलाने के लिए फासीवाद की विचारधारा का अनुसरण करता हो, फासीवादी राज्य कहलाता है। फासीवाद 20 वीं शताब्दी में इटली में बेनिटो मुसोलिनी (1882 - 1945) के नेतृत्व में प्रथम विश्व युद्ध के समय उभरी कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा थी, इसका उदय पूंजीपतियों के सहयोग से हुआ जो तत्कालीन समय में समाजवाद से डरे हुए थे। फासीवाद की विशेषताओं में तानाशाही शासन, व्यक्ति या समाज हित से ऊपर राष्ट्रहित व राज्य की सर्वोच्चता, विपक्ष का जबरन दमन, समाज और अर्थव्यवस्था पर कठोर नियंत्रण शामिल है, इसे सर्वाधिकारवाद का व्यवहारिक रूप माना जाता है। फासीवाद एक व्यवहारिक आंदोलन था जिस कारण अनेक विचारधारा वाले लोगों ने अपने अपने तरीके से इसमें अपना योगदान दिया, जिस कारण फासीवाद का कोई निश्चित सिद्धांत नही बन पाया। फासीवाद का उदय अराजकतावाद, लोकतंत्र, उदारवाद, शांतिवाद तथा मार्क्सवाद के विरोध में हुआ तथा इसे सत्ता की सर्वोच्चता, उग्र राष्ट्रवाद, युद्ध नायकवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तित्व पूजा और कठोर शासन का कट्टर समर्थक माना जाता है। इटली में पनपे इस फासीवादी राजनीतिक आंदोलन का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों खासकर जर्मनी में हिटलर के नाजीवाद के रूप में देखने को मिला, आज भी कट्टर दक्षिणपंथी शासन चलाने वाले राजनीतिक दलों को फासीवादी दल कहकर संबोधित किया जाता है। इटली को हुए आर्थिक नुकसान तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में इटली की करारी हार ने फासीवादी विचारधारा को खोखला साबित किया, फलस्वरूप 1940 के दशक में इस विचारधारा का नाजीवाद सहित अंत हो गया।

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का अर्थ Punjivadi arthvyavastha meaning in hindi

ऐसी आर्थिक व्यवस्था जिसमें वस्तुओं के उत्पादन और वितरण पर व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का नियंत्रण होता है, को पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कहा जाता है। ये व्यक्ति या समूह अपने संचित धन का प्रयोग और अधिक धन संचय के लिए करते हैं। इस प्रकार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दो तत्व हैं निजी पूंजी व निजी लाभ। यह तंत्र पूर्णतः निजी लाभ के लिए चलाया जाता है जिस कारण इसमें मुक्त बाजार का निर्माण होता है तथा वस्तुओं की मांग और पूर्ति पूरी तरह से बाजार की प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करती है। अमेरिका सहित अधिकतर विकसित देश इस अर्थव्यवस्था का अनुसरण करते हैं तथा भारत भी समाजवाद के तत्वों सहित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाए हुए है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के गुणों में बिना सरकारी हस्तक्षेप के व्यवस्था का स्वयं संचालन, आर्थिक स्वतंत्रता, संसाधनों का अनुकूल उपयोग, उत्पादकता में वृद्धि, उत्पादों की गुणवत्ता में वृद्धि, लोगों के जीवन स्तर में सुधार, तकनीकी विकास, बाजार में लचीलापन, पूंजी निर्माण, योग्यतानुसार पुरस्कार, पूंजी निर्माण में प्रोत्साहन, आर्थिक विकास दर में वृद्धि, लोकतंत्र की दृढ़ता में सहयोग इत्यादि शामिल है। तो वहीं पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दोषों में संपत्ति व आय की असमानता, सामाजिक अशांति, वर्ग संघर्ष, एकाधिकारी प्रवृति का उदय, अनियोजित उत्पादन, पूर्ण रोजगार न दे पाने की असफलता, विज्ञापन के कारण उतपत्ति के साधनों का दुरुपयोग, निजी लाभ के कारण सामाजिक कल्याण की अनुपस्थिति, अंसतुलित मांग-पूर्ति के व्यापारिक चक्र, धन का केंद्रीकरण, संपत्ति के उत्तराधिकार के कारण अयोग्य पूंजीवादी वर्ग का उदय इत्यादि शामिल हैं।

प्रस्तावना का अर्थ Prastavana meaning in hindi

संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु अनुच्छेद शुरू होने से पूर्व प्रस्तुत किए गए अंश को प्रस्तावना/ उद्देशिका कहा जाता है। ऑस्ट्रेलियाई संविधान से प्रभावित मानी जाने वाली उद्देशिका संविधान का सार है। उद्देशिका द्वारा संविधान के जिन विषयों को जाना जा सकता है वे हैं - संविधान के आदर्श, आकांक्षाएं, उद्देश्य, इसका शक्ति स्रोत (जो कि भारत के लोग हैं) उद्देशिका की प्रकृति के अनुसार यह संविधान का महत्वपूर्ण अंग नही है क्योंकि यह राज्य के तीनों अंगों में से किसी को भी संवैधानिक शक्ति प्रदान नही करती। यदि किसी विषय पर अनुच्छेद व उद्देशिका के बीच संघर्ष की स्थिति उतपन्न होती है तो ऐसे में अनुच्छेद को वरीयता दी जाती है। उद्देशिका के आधार पर न्यायालय में कोई वाद नही लाया जा सकता। उद्देशिका को एक शोभात्मक आभूषण की तरह माना जाता है जिसका प्रयोग संविधान में विद्यमान अस्पष्टता को दूर करने हेतु किया जाता है। उद्देशिका में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है वे संविधान की स्पष्ट छवि प्रस्तुत करते हैं। अंतिम सार के रूप में हम कह सकते हैं कि उद्देशिका मुख्य रूप से यह बताती है कि संविधान जनता के लिए है और जनता ही अंतिम संप्रभु है तथा वह गणराज्य के अंतर्गत रहते हुए खुद को पंथ निरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, न्याय संगत, स्वतंत्र, समता पूर्ण व बंधुता पूर्ण घोषित करती है। 

लोक प्रशासन का अर्थ Lok Prashasan meaning in hindi

लोक प्रशासन का शाब्दिक अर्थ लोंगो के लिए स्थापित प्रशासन है। प्रशासन एक व्यापक शब्द है इसके लिए इंग्लिश में Administration शब्द का प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के Ad + Ministrare से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है "लोगों की देखभाल करना" या "कार्यों की व्यवस्था करना" है। सरल भाषा में लोक प्रशासन वह व्यवस्था है जो किसी राज्य में बसने वाले मानव समाज को निश्चित दिशा में ले जाने हेतु किए जा सकने वाले सभी कार्यों का क्रियान्वयन करती है, इन कार्यों में मुख्य रूप से आपसी झगड़े सुलझाना, अपराध रोकना व शांति स्थापित करना शमिल है। मौजूदा समय में भारत की केंद्रीय लोक प्रशासन सेवा में 60 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। राज्य अमूर्त होता है तथा लोक प्रशासन सहित अन्य सभी प्रशासनिक सेवाएं मिलकर राज्य को मूर्त रूप प्रदान करती हैं। लोक प्रशासन को राज्य की बाँहें कहा जाता है। लोक प्रशासन आधुनिक समाज का एक आवश्यक अंग है और जीवन का एक प्रमुख तत्व है। समय के साथ ऐसे कार्यों में वृद्धि हुई है जिन्हें लोक प्रशासन द्वारा क्रियान्वित किया जाता है इसी कारण लोक प्रशासन के आकार में लगातार वृद्धि हो रही है, यही कारण है कि आज के राज्य को प्रशासी राज्य (Administrative State) कहा जाता है अर्थात आज के समय में राज्य में कार्यपालिका का प्रभुत्व स्थापित है हालांकि इसमें व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका भी स्वतंत्र रूप से विद्यमान हैं। वर्तमान में लोक प्रशासन मानव जीवन की असंख्य आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, स्वच्छता, सामाजिक सुरक्षा आदि को पूरा करता है अतः इसकी विषय वस्तु सकारात्मक है व सुखी जीवन के लिए आवश्यक है। कुल मिलाकर लोक प्रशासन का अंतिम उद्देश्य मानव कल्याण है।

छायावाद का अर्थ Chhayavad meaning in hindi

छायावाद (1918-1936) हिंदी कविता के इतिहास का प्रसिद्ध आंदोलन है। छायावाद की काव्य धारा में कल्पना, मानवीकरण, प्रकृति प्रेम, नारी प्रेम तथा भावन्मुक्त की प्रधानता है। छायावाद का युग हिंदी साहित्य के चौथे भाग आधुनिक काल में भारतेंदु युग (1868-1900) तथा द्विवेदी युग (1900-1918) के बाद आया। छायावाद के स्पष्ट अर्थ को लेकर हिंदी साहित्य के विद्वान एकमत नही है। आचार्य शुक्ल तथा डॉ. रामकुमार वर्मा छायावाद को रहस्यवाद से जोड़ते हैं तो वहीं डॉ. नागेंद्र इसे स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह बताते हैं। छायावादी कविताओं की रचना द्विवेदी युग की नीरस तथा इतिवृत्तात्मक कविताओं के विरोध में की गई थी। क्योंकि उस दौर का कवि समाज सुधारों की चर्चाओं से भरी द्विवेदी काल की कोरी उपदेशात्मक कविताओं के नीरसपन से ऊब गया था इसलिए छायावाद में कविताएं इतिवृत्तात्मकता (वस्तुओं के विवरण) को छोड़ कल्पना लोक में विचरण करने लगी। छायावाद काव्य धारा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसके बाद बृजभाषा हिंदी की काव्य धारा से बाहर हो गई तथा हिंदी खड़ी बोली गद्य व पद्य दोनों की भाषा बन गई। इससे पूर्व भक्तिकाल तथा रीतिकाल में बृजभाषा को केंद्र में रख कर काव्य रचना की जाती थी। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत तथा महादेवी वर्मा छायावाद के चार स्तंभ माने जाते हैं। छायावाद को साहित्यिक खड़ी बोली का स्वर्णयुग कहा जाता है। छायावाद के नामकरण का श्रेय मुकुटधर पांडेय को दिया जाता है, उन्होंने अपने निबंधों में छायावाद की पाँच विशेषताओं का वर्णन किया है - वैयक्तिकता, स्वांतत्र्य चेतना, रहस्यवादिता, शैलीगत वैशिष्ट्य तथा अस्पष्टता। मुकुटधर पांडेय की कविता "कुररी के प्रति" को छायावाद की प्रथम कविता माना जाता है। इस प्रकार सयुंक्त रूप से छायावाद में जिन तत्वों को झलक व प्रधानता दिखाई देती है वे हैं - वैयक्तिकता (यानी भावों को खुलेआम व्यक्त करना), मानवीकरण, अनुभूति की प्रतिष्ठा, जिज्ञासा, प्रकृति चित्रण (जिसके बिना छायावाद प्राणहीन है), श्रृंगारिकता, रहस्यवाद, स्वच्छंदतावाद, दुख, वेदना, करूणा, निराशा, नारी प्रेम, सौंदर्य चेतना, प्रेमानुभूति, स्वतंत्रता की चेतना, देश प्रेम, राष्ट्रीय भावना, आदर्शवाद, प्रतीकात्मकता, चित्रात्मक भाषा, लाक्षणिक पदावली तथा मुक्त छंद कविताएं।

नौकरशाही का अर्थ Naukarshahi meaning in hindi

किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली में दो कार्यपालिकाएं होती हैं - राजनीतिक कार्यपालिका एवं अराजनीतिक कार्यपालिका। राजनीतिक कार्यपालिका का कार्यकाल चुनावों के परिणामों पर निर्भर करता है इसलिए इसे अस्थायी कार्यपालिका कहा जाता हैं तो वहीं अराजनीतिक कार्यपालिका का कार्यकाल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से अप्रभावित रहता है इसलिए इसे स्थायी कार्यपालिका कहा जाता है, इसी स्थायी कार्यपालिका को आम बोलचाल में नौकरशाही या अधिकारी तंत्र के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार नौकरशाही स्थायी सरकारी मशीनरी की तरह काम करती हैं। नौकरशाही शब्द ब्यूरो (जो कि एक फ्रांसीसी शब्द है) से बना है जिसका अर्थ होता है लिखने का मेज, इस प्रकार ब्यूरोक्रेसी को मेज का शासन कहा जाता है, जहां कार्यालय के मेज पर बैठ कर सरकार चलाई जाती है।

नौकरशाही के अन्य नाम हैं - सिविल सेवा, मैजिस्ट्रेसी, सरकारी निरंकुशवाद, विभागीय सरकार, विशिष्ट वर्ग व गैर-राजनीतिक कार्यपालिका। नौकरशाही के कारण ही समय-समय पर होने वाले राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद शासन-प्रशासन में स्थायित्व व निरंतरता बनी रहती है। नौकरशाही तंत्र एक निर्धारित सेवाशर्त के अधीन, नियम कानून के दायरे में रहकर शक्ति एवं सत्ता का जनहित में प्रयोग करते हैं तथा राजनीतिक नेतृत्व तथा जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं इसलिए इन्हें लोकसेवक भी कहा जाता है। नौकरशाही का अधिकारी तंत्र अपनी प्रकृति से निष्पक्ष, कार्यकुशल, दक्ष एवं प्रशिक्षित प्रशासक होता है जो राजनीतिक नेतृत्व को नीति निर्माण में सहयोग एवं परामर्श देता है तथा सरकार के निर्णयों को कार्यान्वित करता है।

नौकरशाही की विशेषताएं - नियमों-आदेशों व निर्णयों का लिखित रूप, स्पष्ट एवं निश्चित कार्यक्षेत्र, कुशल एंव मेधावी व्यक्तियों की नियुक्ति, तकनीकी नियमों व आदर्शों के आधार पर अधिकारियों के व्यवहार पर नियंत्रण, व्यवस्थित रिकॉर्ड, बाहरी अंकुश की कमी, पदों के एकाधिकार का अभाव, वेतन-पदोन्नति आदि की स्पष्टता।

नौकरशाही के कार्य - नीति-निर्माण संबंधी, विधि निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका, शासन के निर्णयों का पालन करवाना, प्रशासन को सुसंगठित बनाना, सामाजिक परिवर्तन हेतु तैयारी करना, जनता के विभिन्न वर्गों के बीच हितों में सामंजस्य बनाना।

नौकरशाही के गुण - जनकल्याण के लिए अनिवार्य, अनुभवी पदाधिकारियों की जनकल्याण सेवाएं, कार्यकुशलता, विशेषीकरण, अनुशासन, सतर्कता, विचारों में परिवर्तनशीलता, राजनीतिक तटस्थता, कर्तव्यनिष्ठा, न्याय तथा समानता का पालन।

नौकरशाही के दोष - उद्देश्यों की अवहेलना, नियमों की अंधभक्ति, लालफीताशाही, श्रेष्ठता की भावना व स्वयं को विशेषाधिकारी समझना, रूढ़िवादिता व नवीन आवश्यकताओं के प्रति उदासीनता, जनता के प्रति तानाशाही पूर्ण रवैय्या, एक ही व्यवस्था का आपसी असहयोग वाले विभागों में बंट जाना, अत्यधिक औपचारिकता, निर्णय लेने की कमी, कार्य संचालन में विलंभ, कठोर नियमबद्धता, जनता में अश्रद्धा, जन उत्तरदायित्व का अभाव, शक्ति प्रेम, कागजों में हेरा-फेरी, निरंकुशता।

नौकरशाही में सुधार हेतु सुझाव - जनसंपर्क, सत्ता का विकेंद्रीकरण, योग्य-चरित्रवान-निष्ठावान मंत्रियों का चुनाव।

कार्यपालिका का अर्थ Karyapalika meaning in hindi

कार्यपालिका सरकार का वह अंग है जो विधायिका द्वारा स्वीकृत नीतियों और कानूनों को लागू करने के लिए जिम्मेदार है। कार्यपालिका प्रायः नीति निर्माण में भी भाग लेती है। कार्यपालिका का औपचारिक नाम अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न होता है। कुछ देशों में राष्ट्रपति होता है तो कहीं चांसलर। कार्यपालिका में केवल राष्ट्रपति प्रधानमंत्री या मंत्री ही नहीं होते, बल्कि इसके अंदर पूरा प्रशासनिक ढांचा (सिविल सेवा के सदस्य) भी आते हैं। सरकार के प्रधान और उनके मंत्रियों को राजनीतिक कार्यपालिका कहते हैं और वे सरकार की सभी नीतियों के लिए उत्तरदाई होते हैं, लेकिन जो लोग रोज-रोज के प्रशासन के लिए उत्तरदाई होते हैं उन्हें स्थाई कार्यपालिका कहा जाता है।

राजनीतिक चेतना का अर्थ Rajnitik chetna meaning in hindi

राजनीति को लेकर व्यक्ति की आत्म-जागरूकता को ही राजनीतिक चेतना कहा जाता है। यह जान लेना कि अंततः किस प्रकार से राजनीति ही हमारी सभी प्रकार की समस्याओं का कारण है तथा राजनीति को समझ कर व इसकी शक्ति का प्रयोग कर किस प्रकार अपनी समस्याओं को सफलतापूर्वक समाप्त किया जा सकता है यही राजनीतिक चेतना के होने का प्रमाण है। मार्क्स के अनुसार तो हमारी पूरी चेतना ही राजनीतिक अर्थव्यवस्था का प्रतिबिंब मात्र है तथा एक व्यक्ति के विचार उसकी राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों से आकार लेते हैं। जब किसी समाज में राजनीतिक चेतना नही होती तो उसे झूठी चेतना का शिकार होना पड़ता है जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नही होता। उदाहरणतः समाज की ऊँच-नीच तथा गरीबी-अमीरी को सदियों तक भगवान की देन माना जाता रहा क्योंकि राजनीतिक चेतना के अभाव में लोगों ने उन्हीं विचारधाराओं को सच मान लिया गया जो अभिजात वर्ग व तात्कालीन शासकों ने जनता में प्रचारित करवाए। राजनीतिक चेतना के अभाव में ही अधीनस्थ लोग अपनी अधीनता को स्वीकार किए रहते हैं, उन्हें अपनी वास्तविक ताकत का एहसास ही नही होता। उदाहरणतः राजनीतिक चेतना आने तक भारत ने अंग्रेजों की गुलामी को ही स्वीकार किए रखा।

राष्ट्र राज्य का अर्थ Rashtra Rajya meaning in hindi

ऐसा देश जिसमें राष्ट्र (जन समुदाय) व राज्य (राजनीतिक इकाई) में एकरूपता हो, को राष्ट्र-राज्य कहा जाता है। राज्य जब राष्ट्र के अनुरूप होता है तो उसमें स्थायित्व व दृढ़ता पाई जाती है। आधुनिक समय में राष्ट्र-राज्यों की बहुलता है तथा इन देशों में समरूपीय जनसंख्या पाई जाती है जो एक समान रीतिरिवाज, भाषा व धर्म इत्यादि के आधार पर एक जुट हुए होते हैं। भू-राजनीतिज्ञों के अनुसार राज्य, राष्ट्र की राजनीतिक अभिव्यक्ति होता है जिसके रचना तंत्र में राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय रक्षा को अखण्ड बनाये रखने की धारणा होती है। राष्ट्र स्वाभाविक विकास की लम्बी यात्रा का परिणाम है जो रीतिरिवाज, भाषा, धर्म आदि की एकता से स्थापित होता है। 20 वीं शताब्दी में राष्ट्र-राज्य की अवधारणा अपने चरम पर थी जिस कारण यूरोप सहित विश्व के अनेक भागों में समान भाषा, धर्म व संस्कृति इत्यादि के आधार पर अनेक नए देशों का उदय हुआ। ध्यान रखने योग्य है की भारत राष्ट्र-राज्य नही बल्कि राज्य-राष्ट्र है क्योंकि यह विविध समुदायों से मिलकर बना है जिनमें समान इतिहास के कारण एक जुटता की भावना है।

नगर राज्य का अर्थ Nagar rajya meaning in hindi

नगर-राज्य संप्रभुता रखने वाला एक ऐसा राज्य होता है जिसका भौगोलिक क्षेत्र एक नगर या उसके उससे कुछ अधिक होता है। आसान भाषा में एक ऐसा शहर जो स्वतंत्र व संप्रभु है तथा जिसकी अपनी खुद की सरकार, जनसंख्या और क्षेत्र होता है, को नगर राज्य या सिटी स्टेट कहा जाता है। संप्रभुता से यहां तातपर्य उस शक्ति से है जो किसी भी संप्रभु देश की सरकार के पास होती है जो उस देश की सरकार को आंतरिक व बाहरी दबाव के बिना निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करती है। मैजूदा समय में वेटिकन सिटी, मोनोको तथा सिंगापुर इसके उदाहरण हैं। यद्द्पि नगर-राज्य आकार में शहर के बराबर या उससे थोड़े बड़े होते हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये किसी भी राष्ट्र या उससे मिलता जुलता दर्जा रखते हैं। आधुनिक समय में विश्व में राष्ट्र-राज्यों का प्रभुत्व है ज्यादातर देश राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरे हैं लेकिन प्राचीन समय में जब बड़ी टेरिटरी पर शासन करना सरल नही था उस समय नगर राज्यों का प्रभुत्व हुआ करता था। आधुनिक तकनीक व राष्ट्रवादी भावना ने बड़े क्षेत्र पर फैले संप्रभु राज्यों के निर्माण को आसान बना दिया है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण का अर्थ Marksvadi drishtikon meaning in hindi

राजनीतिक विज्ञान के अंतर्गत मार्क्सवादी दृष्टिकोण से अभिप्राय यह है कि कार्ल मार्क्स के राज्य व राजनीति को लेकर क्या विचार थे। दरअसल ज्यादातर दृष्टिकोणों में जहां राज्य को शोषण समाप्त करने, लोगों की रक्षा करने, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने, समानता लाने व किसी भी समाज का शासन चलाने के लिए अनिवार्य तत्व बताया गया है, वहीं मार्क्सवादी दृष्टिकोण राज्य को आवश्यकता को सिरे से नकारता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण का मानना है कि राज्य खुद ही व्यक्ति का शोषण करता है तथा यह संघर्षों को जन्म देता है। मार्क्सवादी लोग वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे को समाप्त करके उसके स्थान पर वर्ग-विहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। जिसमें ऊंच-नीच, जात-पात या अमीर गरीब जैसा कोई वर्ग न रहे तथा सभी आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से एक समान रहें। मार्क्सवादी इसके लिए राज्य की आवश्यकता को नही मानते। इस समानता को पाने के लिए कार्ल मार्क्स सर्वहारा क्रांति का सिद्धांत देते हैं जिसके अनुसार अमीरों और गरीबों के बीच एक दिन संघर्ष होगा और गरीब जीत जाएंगे क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है, तथा जीतने के बाद वे एक साम्यवादी व्यवस्था का निर्माण करेंगे जिसमें वे योग्यतानुसार कार्य करेंगे तथा आवश्यकतानुसार पैसा लेंगे। इस प्रकार सब समान हो जाएंगे तथा अमीर-गरीब का वर्ग-संघर्ष समाप्त हो जाएगा, जिससे राजनीति तथा राज्य की कोई आवश्यकता ही नही रहेगी। हालांकि मार्क्सवादी दृष्टिकोण के आधार पर हुई रूसी क्रांति के बाद वो समानता देखने को नही मिली जिसकी बात मार्क्स ने की थी। बल्कि सोवियत समय के दौरान सत्ता समाज में बंटने की बजाय कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो गई।

उदारवादी दृष्टिकोण का अर्थ Udarvadi Drishtikon meaning in hindi

उदारवादी दृष्टिकोण गतिशील है क्योंकि यह समय के साथ बदल गया है। हालांकि उदारवादी दृष्टिकोण मौजूदा समय में सर्वाधिक प्रचलित व मान्य है। 20 वीं सदी का उदारवाद कल्याणकारी राज्य से जुड़ा हुआ है जो सामाजिक स्वतंत्रता के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी पक्ष लेता है। जानने योग्य है कि उदारवादी विचारधारा अधिक्तर समय व्यक्ति की स्वतंत्रता व अधिकारों पर केंद्रित रही है। जॉन लॉक को आधुनिक उदारवाद का जनक माना जाता है, आधुनिक उदारवाद व्यक्ति के अधिकारों तथा उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अधिक बल देता है तथा चाहता है कि राज्य की शक्तियां व्यक्ति के निजी मामलों में हस्तक्षेप ना करें राज्य केवल शांति स्थापित करने तथा बाहरी आक्रमण से सुरक्षा करने तक सीमित रहे।

उदारवाद व्यक्ति को स्वतंत्रता तो देना चाहता है लेकिन यह भी मानता है कि व्यक्ति स्वार्थी होता है इसलिए वह कई बार अपने हित को पूरा करना के लिए सामने वाले का अहित भी कर सकता है इसलिए उस पर कुछ कानूनी नियंत्रण आवश्यक है और उसी कानूनी व्यवस्था की प्राप्ति हेतु वह राज्य को अनिवार्य मानता है। उदारवादी दृष्टिकोण राज्य द्वारा किसी भी वर्ग के लिए दिए जाने वाले आरक्षण का विरोधी है तथा एक वर्ग के आरक्षण को दूसरे वर्ग का शोषण मानता है, उदारवादी लोग खुली प्रतिस्पर्धा का समर्थन करते हैं।

खुली प्रतिस्पर्धा का अर्थ यह भी नही है कि उदारवादी बाजार को पूरी तरह से लोगों के हवाले कर दे, क्योंकि ऐसी अवस्था में पूंजीपति लोग गरीबों-मजदूरों का शोषण करना शुरू कर देंगे। मूलभूत आवश्यकताओं जैसे दाल, चीनी, अनाज व अन्य जीने के लिए आवश्यक वस्तुओं से जुड़े उद्योग में उदारवादी सरकार का हस्तक्षेप चाहते हैं ताकि जीने के लिए आवश्यक वस्तुओं के लिए मजदूरों को पूंजीपतियों का मोहताज ना बनना पड़े। इस प्रकार जितने भी सार्वजनिक हित हैं उनकी पूर्ति के लिए उदारवादी राज्य की उपस्थिति अनिवार्य मानते हैं, जबकि इसके उलट हमने देखा था कि मार्क्सवादी राज्य का अस्तित्व ही मिटाने के पक्ष में रहते हैं।

उदारवादी मीडिया पर किसी भी प्रकार की बंदिश का विरोध करते हैं तथा राज्य को यह अधिकार नही देना चाहते कि वह किसी भी प्रकार से कोई बात अपने नागरिकों से छुपाने की कोशिश करे। अंततः व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वो प्रत्येक बात को जानें और अपने विवेकानुसार उस पर अमल करें। इस प्रकार उदारवादियों की प्रत्येक माँग व्यक्ति से शुरू होकर व्यक्ति पर आकर ही समाप्त होती है, वे समाज, राज्य व अन्य सभी संगठनों को व्यक्ति के हितों की पूर्ति का साधन मानते हैं।

उदारवादी संगठनों के अलावा धर्म को भी व्यक्ति के बाद ही रखते हैं तथा सभी धर्मों को एक समान मानते हैं। बिना किसी धार्मिक दबाव के प्रत्येक व्यक्ति को अपने अनुसार किसी भी धर्म का अनुसरण करने की स्वतंत्रता व पूर्णतः अपने अनुसार जीवन जीने का अधिकार देने के समर्थक हैं। जहां उदारवाद एक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है वहीं उससे यह भी अपेक्षा करता है कि वह अन्य व्यक्तियों पर किसी धर्म को मानने का दबाव ना बनाए, तथा सभी के धर्मों, विश्वासों तथा रीति रिवाजों का सम्मान करे। इस प्रकार उदारवाद जिओ और जीने दो के सिद्धांत के करीब ही अपने विचार रखता है।

धर्म के बाद परिवार तक को भी उदारवाद व्यक्ति पर दबाव बनाने से वंचित करने का पक्षधर है, इस प्रकार व्यक्त किससे शादी करना चाहता है तथा परिवार के।साथ रहना चाहता है या नही यह पूर्णतः उसके विवेक पर छोड़ने की बात कहते हैं इस प्रकार हम देखते हैं की उदारवादी लगभग सब कुछ व्यक्ति और व्यक्ति के विवेक पर छोड़ने के पक्षधर हैं।

राजनीति के क्षेत्र में उदारवाद एक उत्तरदायी तथा प्रतिनिधि संस्था का समर्थन करता है। जिससे स्पष्ट होता है कि यह लोकतंत्र के समर्थक हैं क्योंकि उत्तरदायी व प्रतिनिधि सरकार लोकतंत्र का उत्पाद है। उदारवादी सत्ता के विकेंद्रीकरण को उचित ठहराते हैं। उदारवादी इस बात पर बल देते हैं कि व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का दबाव नही होना चाहिए जितनी अधिक हो सके उसे स्वतंत्रता दी जानी चाहिए हालांकि स्वतंत्रता इतनी भी ना हो कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के निजी क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगे।

इस प्रकार उदारवादी दृष्टिकोण एक ऐसा दृष्टिकोण है जो यह मानता है कि व्यक्ति एक विवेकशील प्रार्णी है तथा जितनी भी आज व्यवस्थाएं हम देखतें है वो खुद व्यक्ति ने बनाई हैं चाहे वो राज्य हो, समाज हो या परिवार। इसलिए व्यक्ति को किसी भी प्रकार से इनके अधीन नही किया जाना चाहिए हालांकि उनकी प्रकृति पर अंकुश रखने के लिए राज्य व अन्य संस्थाओं द्वारा कुछ नियम लगाए जाने चाहिए, कुल मिलाकर सकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति को दी जानी चाहिए, जो उसे स्वतंत्र भी रखे और दूसरे की स्वतंत्रता का हनन भी ना करने दे।

कल्याणकारी राज्य का अर्थ Kalyankari Rajya meaning in hindi


चाणक्य, अरस्तु और प्लेटो के काल से ही किसी भी देश के शासन को चलाने के लिए एक ऐसी शासन व्यवस्था की खोज करने की कोशिश की जाती रही है, जो लोगों का ज्यादा से ज्यादा भला कर सके और जिस व्यवस्था को ज्यादा से ज्यादा लोग अच्छा माने। अच्छे शासन की तलाश में बहुत सी विचारधाराएं आई जो शासन शक्ति को अलग-अलग हाथों में सौंपना चाहती थी, कुछ विचारधाराएं ऐसी आई जो शासन को समाज के हाथ में सौंप देना चाहती थी जैसे कि समाजवाद। तो कुछ विचारधाराएं ऐसी आई जिन्होंने राज्य यानी कि सरकार की आवश्यकता को ही नकार दिया, साम्यवाद और अराजकतावाद ऐसी ही विचारधाराएं रही हैं जो व्यक्ति के जीवन में राज्य की कोई आवश्यकता नहीं मानती। इनका मानना है कि यदि राज्य ही नही होगा तो व्यक्ति का शोषण ही नही होगा और वो सदैव सुखी रहेगा। तो वही फासीवाद और नाजीवाद जैसी विचारधाराओं ने यह सिद्ध करने की कोशिश की, कि राज्य अति आवश्यक है और इसका प्रत्येक व्यक्ति पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए, तभी कोई देश सफल हो सकता है तथा नागरिकों के जीवन में सुख और समृद्धि आ सकती है।

इन सब विचारों को पार करते हुए आज हम जिस सिद्धांत पर हम पहुंचे हैं तथा जो लोगों की खुशहाली में सबसे कारगर सिद्ध होता दिखाई देता है, वह है "लोक कल्याणकारी सिद्धांत" लोक कल्याणकारी सिद्धांत साम्यवाद और अराजकतावाद की तरह राज्य को अनावश्यक नहीं मानता, बल्कि उसके ऊपर लोगों का कल्याण करने की जिम्मेदारी डाल देना चाहता है। लोक कल्याणकारी सिद्धांत कहता है कि राज्य एक आवश्यक व अनिवार्य संघ है, लेकिन इसका लक्ष्य "पुलिस राज्य" की तरह कानून व्यवस्था बनाने तक ही सीमित नही होना चाहिए, बल्कि इसका अंतिम लक्ष्य सभी नागरिको के जीवन को सुखी बनाना होना चाहिए, अंतिम व्यक्ति भी राज्य की शासन व्यवस्था में खुश रहे तथा निरंतर विकास करता रहे इस तरह से राज्य को शासन करना चाहिए।

लोक कल्याण का यह सिद्धांत इतना लोकप्रिय हुआ कि आज विश्व के अधिकांश राज्यों तथा उनकी पूरी व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य लोक कल्याण हो गया है और इनकी लोक कल्याणकारी प्रवृति के कारण ही इन्हें "कल्याणकारी राज्य" कहा जाता है।

19वीं शताब्दी तक दुनिया के ज्यादातर देशों में "पुलिस राज्य" की धारणा काम करती थी, पुलिस राज्य एक ऐसा राज्य होता है, जहां पर सरकार अपने आपको केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित रखती है तथा लोक कल्याण का दायित्व व्यक्तियों पर छोड़ देती है, लेकिन पुलिस राज्य की अवधारणा के बावजूद भी हमने देखा कि उन राज्यों ने भी निरंतर लोक कल्याण के लिए बहुत से कार्य किए, जिन्होंने किसी न किसी रूप में कल्याणकारी राज्य की उत्पत्ति में सहायता की है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि इंग्लैंड में सबसे पहले रानी एलिजाबेथ ने गरीबी कानून पारित किया जिसके तहत गरीबों, अपाहिजों व अनाथों की सेवा तथा पालन पोषण पर विशेष ध्यान दिया गया। इस तरह का कानून सर्वप्रथम इंग्लैंड में आने से स्पष्ट होता है कि कल्याणकारी राज्य की शुरुआत इंग्लैंड से हुई है।

हालांकि यूरोप के अन्य देशों में भी इसके बीज दिखाई देते हैं, नेपोलियन ने फ्रांस के नागरिकों को खुश करने के लिए सार्वजनिक मताधिकार, मजदूर संघ, मजदूरी में वृद्धि तथा बीमा योजनाएं चलाई थी, जो लोक कल्याण के अंतर्गत आती हैं। तो वहीं जर्मनी में बिस्मार्क ने बीमारी, दुर्घटना व बुढ़ापा संबंधी बीमा योजनाए चलाई तथा सामाजिक सुरक्षा संबंधी नीतियां बनाई जिन्होंने जर्मनी में लोक कल्याण की भावना का विकास किया। अमेरिका में शुरुआती तौर पर लोक कल्याणकारी नीतियों का विरोध किया गया, क्योंकि उनका मानना था कि ये नीतियां राज्य को दिवालिया बना देंगी। लेकिन इसके बावजूद वहां सामाजिक सुरक्षा, निशुल्क शिक्षा तथा वृद्धाश्रम के रूप में लोक कल्याणकारी योजनाएं चलाई गई।

भारत के संदर्भ में लोक कल्याणकारी राज्य की भावना का विकास देखा जाए तो, भारत में लोक कल्याण की प्रथा प्राचीन काल से ही प्रचलित रही है। लेकिन राज्य से संबंधित लोक कल्याण की भावना हमें ब्रिटिश काल से दिखाई देती है, जब सती प्रथा तथा बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाओं के विरोध में कदम उठाए गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारतीय संविधान की प्रस्तावना तथा नीति निर्देशक सिद्धांतों का मूलभूत उद्देश्य यही है कि भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाया जाए, इसके अंतर्गत भारत में जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त साधन, भौतिक साधनों का सार्वजनिक स्वामित्व, स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि, बेकारी, बुढ़ापा तथा अंग-भंग की स्थिति में सार्वजनिक सहायता, कुटीर उद्योगों का विकास, बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल व स्त्रियों से संबंधित कार्यक्रम इत्यादि यह सभी प्रावधान ऐसे हैं, जो भारत को एक कल्याणकारी राज्य की तरफ लेकर जाते हैं। इनमें ग्राम पंचायतों की स्थापना तथा बेरोजगारी दूर करने के उपाय भी शामिल है, इसके साथ ही बच्चों को दी जाने वाली निशुल्क शिक्षा भी भारत का एक कल्याणकारी राज्य की ओर बढ़ता कदम है।

कल्याणकारी राज्य के बारे में कुछ विद्वानों की परिभाषाएं हैं महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें हमें पढ़ना चाहिए, इनमें डॉ. अब्राहिम लिंकन ने कल्याणकारी राज्य की परिभाषा देते हुए कहा है कि "कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान वितरण के उद्देश्य से करता है" तो वहीं गारनर के अनुसार - कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य राष्ट्रीय जीवन, राष्ट्रीय धन तथा जीवन के भौतिक, बौद्धिक तथा नैतिक स्तर को विस्तृत करना है" कांट के शब्दों में "कल्याणकारी राज्य का अर्थ उस राज्य से है जो अपने नागरिकों के लिए अधिकतम सामाजिक सुविधाएं प्रदान करे"

कल्याणकारी राज्य की विशेषताओं के बारे में बात करें तो, इसकी सबसे पहली विशेषता यह है कि लोक कल्याण की भावना ही इसका मुख्य उत्तरदायित्व है, लोक कल्याण की भावना होने से तात्पर्य यह नहीं है कि राज्य जब लोग कल्याण संबंधी कार्य करता है, तो वह नागरिकों पर कोई उपकार करता है, बल्कि यह राज्य का उत्तरदायित्व है कि वह व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करें, क्योंकि इसी कार्य के लिए व्यक्ति ने उसे शासन सौंप हुआ है। इसलिए लोक कल्याण की भावना कल्याणकारी राज्य की प्रथम विशेषता होती है।

कल्याणकारी राज्य की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें सर्वांगीण विकास की भावना होती है, यह सभी नागरिकों को एक साथ लेकर चलने वाला होता है। कल्याणकारी राज्य इस तरह से कार्य नही करता कि एक व्यक्ति का भला करते हुए यह दूसरे व्यक्ति का अहित कर दे, या किसी एक समुदाय को महत्व दे और दूसरे को निम्न कोटि का समझे, बल्कि सभी नागरिकों का सर्वांगीण विकास हो यही भावना लेकर कल्याणकारी राज्य चलता है।

कल्याणकारी राज्य की तीसरी विशेषता आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा की भावना है। सामाजिक तौर पर यह किसी भी प्रकार की कुप्रथा का विरोध करता है तथा लोगों को सामाजिक स्तर पर समान अवसर प्रदान करता है। आर्थिक स्तर पर यह लोगों को एक समान आय के साधन, एक समान रोजगार प्राप्ति के अवसर तथा समान संपत्ति का अधिकार प्रदान करता है, तथा राजनीतिक स्तर पर यह सभी को सत्ता प्राप्ति के समान अवसर प्रदान करता है जिससे कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार राज्य का हिस्सा बनकर नागरिकों के विकास में सहयोग दे सकता है।

कल्याणकारी राज्य की चौथी विशेषता यह है कि यह दरिद्रता तथा अभाव का उन्मूलन करता है, यदि एक राज्य के शासन में नागरिकों में दरिद्रता तथा अभाव आदि की भावना आती है, तो ऐसा ऐसा कल्याणकारी राज्य कभी भी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं कर सकता, उसके लिए आवश्यक है कि वह ऐसे कार्य करें जिससे नागरिकों में दरिद्रता तथा अभाव की भावना ना आए।

कल्याणकारी राज्य की पांचवी तथा अंतिम विशेषता है कि यह अपने प्रत्येक नागरिक के जन्म से लेकर उसके संपूर्ण जीवन तक उसके सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेता है, पुलिस राज्य की तरह है यह केवल कानूनी व्यवस्था तक सीमित रहने की बजाय नगरियों के संपूर्ण जीवन को किस प्रकार से खुशहाल रखा जाए, इस उद्देश्य को केंद्र में रखकर शासन करता है।

कल्याणकारी राज्य की उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कुछ कार्य करता है, इसका सबसे पहला कार्य है प्रशासन तथा जनता के बीच की दूरी को कम करना, ताकि प्रशासन जनता हित में जो भी कार्य करता है वे जनता तक पहुंच सके। कल्याणकारी राज्य का दूसरा कार्य है सामाजिक न्याय देना, प्रत्येक देश के नागरिक समाज में रहते हैं इसलिए उनके बीच जाति, धर्म, वंश, लिंग, प्रजाति, रंग या नस्ल इत्यादि के आधार पर भेदभाव ना हो तथा सभी नागरिकों को सामाजिक न्याय मिले यह कल्याणकारी राज्य का दूसरा सबसे बड़ा कार्य है।

कल्याणकारी राज्य का तीसरा कार्य है सामाजिक नीतियां बनाना, इन नीतियों में आरक्षण नीति सर्वोच्च है तथा अन्य नीतियों में बाल नीति, आवास नीति, शिक्षा नीति एवं स्वास्थ्य नीति आदि प्रमुख हैं, जो सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। कल्याणकारी राज्य का चौथा कार्य है सामाजिक कानून बनाना तथा समाज में जो भी व्याप्त कुरीतियां है उन्हें पहचान कर, लगातार दूर करने का प्रयास करते रहना। भारत के संदर्भ में छुआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा, बाल श्रम, वेश्यावृत्ति तथा बंधुआ मजदूरी इत्यादि पर प्रभावी रोक लगाने में राज्य काफी हद तक सफल हुआ है, लेकिन लोक कल्याणकारी राज्य का इरी यहां समाप्त नही होता, उसका यह कर्तव्य होता है कि वह निरंतर इन कुरीतियों की पहचान कर उन्हें समाज से समाप्त करता रहे, क्योंकि समय के साथ नई कुरीतियां समाज में जन्म लेती रहती हैं।

कल्याणकारी राज्य का पांचवां कार्य है जन सहयोग प्राप्त करना, क्योंकि वह जिन भी नीतियों और योजनाओं का संचालन करता है उनकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि आमजन भी उसका सहयोग करें क्योंकि कल्याणकारी राज्य की योजनाओं की सफलता इस बात में है कि जनता व्यवहारिक रूप से उसके कार्यों में कितना योगदान कर रही है। कल्याणकारी राज्य का छठा कार्य है दुर्बल तथा भेदभाव के शिकार व्यक्तियों तक विकास को पहुंचाना तथा तथा उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का निरंतर प्रयास करना। इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि जब तक विकास देश के अंतिम नागरिक तक नहीं पहुंच जाता, तब तक यह उस दिशा में लगातार कार्य करता रहे।

कल्याणकारी राज्य का सातवां तथा अंतिम कार्य यह है कि यह अपनी सफलताओं का लगातार मूल्यांकन करता रहे तथा जो भी सार्वजनिक धन इसे प्राप्त होता है उसे सावधानीपूर्वक खर्च करें, इस धन का अधिक से अधिक प्रयोग व्यर्थ के खर्चों की बजाय जनता के हित में होना चाहिए।

यदि भारत के बारे में बात की जाए कि भारत ने एक कल्याणकारी राज्य के रूप में किस प्रकार से कार्य किए हैं, तो हम देख सकते हैं कि भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने नीति निदेशक सिद्धांतों के जरिए खुद को एक कल्याणकारी राज्य की ओर विकसित करने का लक्ष्य रखा हैम इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भारत में बहुत से ऐसे कार्य हुए हैं जो भारत को एक कल्याणकारी राज्य है के रूप में प्रदर्शित करते हैं इनमें पिछड़े, दीन-हीन, अक्षम, निशक्त तथा प्रताड़ित किए गए व्यक्तियों का विकास, पुनर्वास तथा सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। महिलाएं, बच्चे, नशेड़ी, वृद्ध, असहाय, आदिवासी तथा पिछड़ी जातियों के नागरिकों को सम्मान प्रदान करने के लिए सरकार लगातार कार्य कर रही है। इसके अलावा जो भी कानून भारत में बनाए जाते हैं उनके लिए दिशा-निर्देश संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों से लिए जा रहे हैं, तो वहीं श्रमिकों के हितों की रक्षा, महिलाओं व बच्चों को सहयोग देने तथा नियोगयिताग्रस्त लोगों को उच्च जीवन प्रदान करने के लिए भी बहुत सी योजनाएं भारत सरकार चला रही है। भारत में प्रत्येक समुदाय व वर्ग के लिए समान रूप से प्रयास किए जा रहे हैं इसमें कुटीर उद्योगों के विकास के साथ-साथ कृषि का विकास भी किया जा रहा है, पुरुष विकास ज साथ महिला के विकास पर भी उचित ध्यान दिया जा रहा है तथा दोनों के लिए समान वेतन की व्यवस्था की गई है, दोनों के लिए समान सामाजिक न्याय की व्यवस्था की गई है। सभी प्रकार के वर्गों को समाज में बराबरी दिलाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है तथा सभी शिशुओं को उचित प्रारंभिक स्वास्थ्य मिले इसके लिए अस्पतालों में निशुल्क सेवाएं चलाई जा रही हैं, तो वहीं सभी बच्चों को भरपूर पोषण मिले इसके लिए मिड डे मील जैसी व्यवस्था विद्यालयों में शुरू की गई है, साथ में कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए कानून बनाए गए हैं। साथ ही किसानों के लिए भी सरकार समय-समय पर सहायता उपलब्ध करवाती रही है, इसके साथ ही जातिगत व्यवस्था को तोड़ने के लिए भी सरकार ने कानून बना रही है जिसके अंतर्गत जाति प्रथा को तोड़ने के लिए सरकार इंटर-कास्ट मैरिज जैसी समाजिक पहलों को सार्वजनिक सहयोग दे रही है तथा शैक्षिक, राजनीतिक व आर्थिक समानता के लिए शिक्षा संस्थानों, सरकारी संस्थाओं तथा नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर रही है।

अंत में हम कह सकते हैं कि आधुनिक युग में अधिकतर सरकारें लोक कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित हैं, कल्याणकारी राज्य का विकास धीरे-धीरे हुआ है, इसने प्राचीन काल के पुलिस राज्य से खुद को कल्याणकारी राज्य में परिवर्तित किया है, तथा व्यक्ति विकास में लगातार अपना योगदान दिया है। लेकिन कल्याणकारी राज्य के उद्देश्य अनंत है इसलिए राज्य के साथ-साथ सभी नागरिकों का भी है कर्तव्य है कि वे इन उदेश्यों की पूर्ति में कल्याणकारी राज्य का सहयोग करते रहें। 

उदारवादी नारीवाद का अर्थ | Udarvadi Narivad meaning in hindi

नारीवादी दृष्टिकोण के मुख्य रूप से दो कोण हैं उदारवादी नारीवाद तथा कट्टरपंथी नारीवाद।

उदारवादी नारीवाद को मुख्यधारा का नारीवाद कहा जाता है। उदारवादी नारीवादियों का मानना है कि सामाजिक संस्थाओं में महिलाओं की आवाज तथा उनकी पहचान का सही मायने में प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता। जिसकी वजह से महिलाओं के प्रति भेदभाव पूर्ण नियम व कानून बनते हैं यही कारण है कि महिलाएं विकास से वंचित रहती है। इसलिए उदारवादी नारीवाद मानता है कि महिलाएं अपनी सोच बदल कर और अलग-अलग क्षेत्रों में अग्रिम भूमिका निभाकर समानता पा सकती हैं। इस प्रकार उदारवादी नारीवाद उदार लोकतंत्र के ढांचे के भीतर राजनीतिक और कानूनी सुधार के मध्यम से लैंगिक समानता को प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर चलता है।

उदारवादी नारीवाद वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में ही महिलाओं के लिए विकास को पाने का समर्थक है। उदारवादी नारीवाद महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए उन सभी बाधाओं को समाप्त कर देना चाहता है जो सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के कानूनों, राजनीतिक संगठनों, धार्मिक संगठनों, शिक्षा तथा कार्य क्षेत्र में महिलाओं पर थोपी गई हैं। उदारवादी नारीवाद इन्ही बाधाओं को प्राचीन काल से अब तक रही महिलाओं की दयनीय हालत का जिम्मेदार मानता है तथा इस बात में विश्वास रखता है कि इन बाधाओं को दूर करने से समाज में स्त्री व पुरुष समानता को प्राप्त किया जा सकता है।

उदारवादी नारीवाद वर्तमान समय में राज्य और व्यक्ति के बीच शक्ति के बंटवारे का काफी हद तक समर्थक है तथा मौजूदा ढाँचे को ही बदल डालने में विश्वास नही रखता। वह यह नही चाहता कि जिस प्रकार से पुरुष, स्त्री पर सदियों तक हावी रहा है उसी प्रकार अब स्त्री, पुरुष पर हावी रहे, बल्कि वह केंद्रीय सत्ता का पक्षधर है जिसके अंतर्गत वह मानता है कि जितने अधिकार पुरुषों को प्राप्त हैं उतने ही अधिकार स्त्रियों के भी होने चाहिएं। इस प्रकार वह किसी भी एक जेंडर की सत्ता के पक्ष में नही है तथा वें महिलाएं जो मैजूदा सामाजिक ताने-बाने के अंतर्गत रहकर ही समानता व अन्य अधिकारों को पाना चाहती हैं, उदारवादी नारीवाद का समर्थन करती हैं।

अब प्रश्न यह आता है कि उदारवादी नारीवाद राज्य से क्या चाहता है। दरअसल उदारवादी नारीवाद मानता है कि राज्य संसद में महिलाओं के लिए सीटें बढ़ाने, महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करने जैसे कदम उठाकर पुरुषों तथा महिलाओं के बीच समानता लाने में अपनी भूमिका निभा सकता है। इसीलिए वे देश जहां पर महिलाओं को नौकरी, शिक्षा तथा राजनीतिक क्षेत्र में आरक्षण मिलता है वह राज्य द्वारा महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने की पहल का ही नतीजा है।

उदारवादी नारीवाद महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिलाने के लिए पुरुषों के सहयोग को भी स्वीकार करता है, प्रगतिशील पुरुष जो महिलाओं की बराबरी के अधिकारों के समर्थक हैं वे भी उदारवादी नारीवाद के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार सत्ता को ही पलट देने की सोच रखने की बजाय उदारवादी नारीवाद धीमे विकास व प्रयत्न को मान्यता देता है तथा किसी भी प्रकार की क्रांति का विचार नही रखता, कुल मिलाकर वह मौजूदा व्यवस्था का तो समर्थक है लेकिन इस व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति में लगातार सुधार चाहता है, जब तक कि समाज, राज्य व अन्य किसी भी संस्था की नजर में महिला व पुरुष समान न हो जाएं।

उदारवादी नारीवाद का तर्क है कि समाज महिलाओं को लेकर झूठी धारणाएं रखता है कि महिलाओं की बौद्धिक तथा शारीरिक क्षमता प्राकृतिक रूप से कम होती है यही कारण है कि समाज जब भी कोई संस्था बनाता है, कानून बनाता है या अन्य किसी भी प्रकार की व्यवस्था का निर्माण करता है तो महिलाओं को कम आंकते हुए उनके अधिकार पुरुषों के मुकाबले सीमित कर देता है। भारतीय समाज में यह धारणा की शाम होने से पहले लड़कियों या महिलाओं को घर आ जाना चाहिए इसी प्रकार की एक बंदिश है जो समाज इस आधार पर बनाता है कि महिलाएं शारीरिक व बौद्धिक रूप से कमजोर हैं तथा अपना बचाव कर पाने में असमर्थ हैं।

उदारवादी नारीवाद महिलाओं की अधीनता का कारण उन प्रथाओं तथा कानूनी प्रतिबंधों को मानता है जो महिलाओं को सार्वजनिक दुनिया में जाने से रोकता है। यही कारण है कि पुरुष तथा महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। जहां महिलाओं को पर्दा प्रथा तथा बुर्का इत्यादि के रूप में सार्वजनिक जीवन में भी बंदिशों का सामना करना पड़ता है वहीं पुरुष इन सब बंधनों से मुक्त है, पुरुष की इस मुक्ति तथा महिलाओं की इस अधीनता की जड़ें उन प्रथाओं तथा कानूनी प्रतिबंधों में छुपी हुई हैं जो सामाजिक संगठनों ने महिलाओं को कमत्तर आंकते हुए बनाई हैं।

उदारवादी नारीवाद व्यक्तिवादी सोच रखता है तथा समाज, राज्य या अन्य संस्था पर केंद्रित होने की बजाए व्यक्ति केंद्रित है, और व्यक्तियों में इसका केंद्र नारी है जिसे वह पुरुष की समान अधिकार दिलाना चाहता है। उदारवादी नारीवाद किसी भी प्रकार की फिलोसॉफी बनाने की बजाए व्यवहारिक रूप से बदलाव लाने का पक्षधर है। यह केवल विचारों में महिलाओं को सम्मान देने की बजाए उन्हें व्यवहारिक रूप से स्वतंत्र करना चाहता है क्योंकि सम्मानीय दर्जे की आड़ में महिलाओं की स्वतंत्रता को सदियों तक छीना जाता रहा है जिससे महिलाओं के शोषण को अदृश्य गति मिलती रही है। भारतीय व्यवस्था के आधार पर देखा जाए तो महिलाओं को देवी के समान माना जाता है लेकिन वहीं जब वो शिक्षा पाने या अन्य अधिकारों की माँग करती है तो व्यवहारिक रूप से उसे उन सब अधिकारों से वंचित रखा जाता है। इसलिए उदारवादी नारीवाद वैचारिक सम्मान से ज्यादा व्यवहारिक स्वतंत्रता व अधिकारों पर अधिक बल देता है।

उदारवादी नारीवाद की जड़ें हमें क्लासिकल उदारवाद में दिखाई देती हैं, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थक है। 18 वीं सदी के समाज में जहां व्यक्ति आधारित स्वतंत्रता की माँग जोर पकड़ने लगी थी वहीं महिलाओं में भी स्वतंत्रता व अधिकारों की चेतना जागी तथा वे मताधिकार की मांग करने लगी। मताधिकार पाने की माँग का  अर्थ ये था कि वे अपने शासक के चुनाव में अपनी भागीदारी चाहती थी ताकि वो शासक महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में भी सोचे, जो प्राचीन काल से पुरुषों की क्रूरता का शिकार होती रही हैं, तथा उन्हें दोयम दर्जे से पूर्ण व्यक्ति का दर्जा मिल सके व समाज के दोनों वर्गों में समानता लाई जा सके। उन्होंने मांग की कि कोई भी सरकारी नियम या सामाजिक प्रथा उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध न लगाए। इन अधिकारों को पाने के लिए महिलाओं का राजनीतिक हस्तक्षेप आवश्यक था इसलिए मताधिकार की माँग उठने लगी। इन्ही माँगो का परिणाम था कि वर्ष 1920 में अमेरिका में महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया गया।

उदारवादी नारीवाद केवल महिलाओं के वोट अधिकार तक ही सीमित नही रहा है, बल्कि इसने जिन उद्देश्यों की प्राप्ति की है उनमें महिलाओं को अपनी इच्छानुसार प्रजनन करने व गर्भपात करवाने का अधिकार भी मिला है। इसके अलावा वे यौन उत्पीड़न के खिलाफ न्यायालय जा सकती हैं, शिक्षा तथा कार्यस्थल पर उन्हें समान दर्जा दिया जाता है। साथ ही राज्य यह भी मानता है कि महिलाओं को बच्चे की देखभाल में सहायता हेतु सस्ती चाइल्डकेयर सुविधा गर्भधारण के बाद खुद की स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए। क्योंकि बच्चे की देखरेख तथा गर्भधारण के दौरान महिलाओं स्वास्थ्य की देखभाल में उचित सहायता व मार्गदर्शन भी एक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है, इसलिए आज हम सरकारी अस्पतालों में शिशुओं को लेकर दी जाने वाली विशेष फ्री सुविधाओं को देखते हैं। इन सब उद्देश्यों की प्राप्ति में उदारवादी नारीवाद का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

हालांकि यह सब कुछ जानने के बाद हमें प्रतीत होता है कि उदारवादी नारीवाद में कोई बुराई नही है लेकिन इसकी आलोचना करने वाले कुछ तर्क देते हैं, इसमें सबसे पहला तर्क यह है कि, हालांकि उदारवादी नारीवाद महिलाओं को व्यक्तिगत तौर पर पुरुषों से स्वतंत्र कर देगा लेकिन राज्य की सत्ता पितृसत्तात्मक है तथा उदारवादी नारीवाद जिस तरह से इसी तंत्र में रहकर समानता पाना चाहता है उसे वह प्राप्त नही कर सकता इसलिए पितृसत्तात्मक राज्य पर चोट करने के लिए तथा उसे बदलने के लिए नारीवाद को और अधिक कड़ा रुख अपनाने होगा, क्योंकि एक पितृसत्तामक राज्य कभी भी समाज की पितृसत्तामक सत्ता को समाप्त नही कर सकता।

आलोचक आगे कहते हैं कि उदारवादी नारीवाद जो कुछ महिलाओं के लिए कर रहा है वो देखने में बहुत कुछ लग सकता है लेकिन यह अपनी चरम स्थिति तक भी पर्याप्त नही होगा। इसलिए कुछ सुधारों की आस में जीने की बजाय पूरी व्यवस्था को बदल कर महिलाएं वास्तविक रूप में अपनी स्थिति को पुरुषों की तरह मजबूत कर सकती हैं। साथ ही उदारवादी नारीवाद कुछ समुदायों की महिलाओं के लिए तो पर्याप्त है लेकिन अलग-अलग संस्कृतियों में जो महिलाओं की दशा है उसे अनदेखा करता है। क्योंकि जिस प्रकार इसने सफेद महिलाओं के लिए काम किया है आवश्यक नही है कि यह अन्य नस्लों के महिलाओं के लिए भी उतने ही प्रभावी ढंग से काम करेगा क्योंकि अन्य नस्लों की संस्कृतियां बहुत हद तक सफेद नस्ल से भिन्न हैं।









वर्ग संघर्ष का अर्थ | Varg Sangharsh Meaning in Hindi

वर्ग संघर्ष जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स का दिया हुआ सिद्धांत है जो कहता है कि समाज हमेशा से अमीर और गरीब नाम के दो वर्गों बंटा रहा है, और इन दोनों वर्गों के हित आपस में टकराने से दोनों के बीच हमेशा संघर्ष बना रहता है, यही वर्ग संघर्ष यानी क्लास स्ट्रगल है।

मार्क्स के अनुसार ये दोनों वर्ग मीन्स ऑफ प्रोडक्शन को लेकर आपस में बंटे हुए हैं, मीन्स ऑफ प्रोडक्शन, जमीन, लेबर और पैसे को कहा जाता है। जो वर्ग जमीन, लेबर और पैसे पर नियंत्रण किए हुए है उसे अमीर, सामंत, बुर्जुआ या पूंजीपति वर्ग कहा जाता है, और जिसके पास इनका नियंत्रण नही है, उसे गरीब, किसान, सर्वहारा या श्रमिक वर्ग कहा जाता है, श्रमिक वर्ग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पूंजीपतियों पर डिपेंड करता है, तथा इनके द्वारा चलाए गए कारखानों में काम करता है, बदले में वे उसे पैसा देते हैं।

पूंजीपति लोग ज्यादा लाभ कमाने के लालच में श्रमिकों का शोषण करते हैं, और इन्हें कम से कम सेलरी देना चाहते हैं, जबकि श्रमिक अपनी जरूरत पूरी ना होने के चलते ज्यादा सेलरी की माँग करते हैं, इस वजह से संघर्ष पैदा होता है, क्योंकि एक के फायदे में दूसरे का नुकसान छुपा हुआ है।

मार्क्स कहता है कि यह संघर्ष सदियों से चला आ रहा है, बस शोषक और शोषितों का नाम बदल गया है, इनका नाम पहले सामंत और किसान हुआ करता था, आज ये दोनों वर्ग कारखानों के मालिक और मजदूर हो गए हैं।

मार्क्स इस संघर्ष का अंत भी बताता है, अपनी पुस्तक साम्यवादी घोषणापत्र में वह लिखता है की पूंजीवाद अपनी ही बनाई व्यवस्था का शिकार होकर समाप्त हो जाएगा, क्योंकि इसकी प्रवृति अधिक से अधिक धन कमाने की है, जिससे धन एक तरफ संकुचित होता है, समय के साथ धन कुछ ही पूंजीपतियों तक सीमित होने लगेगा तथा इनकी सँख्या लगातार कम होने लगेगी, तो वहीं प्रोडक्शन बढ़ने से श्रमिकों की सँख्या ज्यादा होने लगेगी, सर्वाधिक अमीर पूंजीपति ज्यादा प्रोडक्शन की खपत के लिए दूसरे देशों और अंततः वे अपनी शक्ति को पहचान कर क्रांति कर देंगे और पूंजीपतियों को उखाड़ फेकेंगे। इस प्रकार केवल श्रमिक वर्ग की शेष रह जाएगा।




द्वैतवाद क्या है / Dvaitavad kya hai / Dvaitavad meaning in Hindi

द्वैतवाद धर्म से संबंधित एक सिद्धांत है, जो कहता है कि मनुष्य और भगवान अलग-अलग वास्तविकताएं हैं, यह सिद्धांत मध्वाचार्य द्वारा दिया गया है, ...