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Article 17 meaning in Hindi | अनुच्छेद 17 का मतलब | Article 17 in Hindi | Anuched 17 | Article 17 of Indian Constitution

भारतीय संविधान भाग 3 | अनुच्छेद 17

दोस्तों, भारत के संविधान में हमें छः (मूल रूप से सात, एक अधिकार को कानूनी अधिकार बना दिया गया है) मौलिक अधिकार दिए गए हैं जो कि संविधान के भाग तीन में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौजूद हैं। इन्हीं में से एक अनुच्छेद है "अनुच्छेद 17" इस लेख में इसी Article 17 in Hindi के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करेंगे। इस लेख को पढ़ने के बाद आप समझ पाएंगे कि अनुच्छेद 17 क्या है, यह किससे संबंधित है, और इससे जुड़े वह सभी तथ्य जो परीक्षाओं की दृष्टि से और एक नागरिक होने के नाते आपको पता होना चाहिए।


अनुच्छेद 17 क्या है? 

अनुच्छेद 17 संविधान के भाग तीन के अंतर्गत मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ एक अनुच्छेद है। इसे संविधान में प्रकार लिखा गया है:

"अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और किसी भी रूप में इसका अभ्यास वर्जित है। अस्पृश्यता से उत्पन्न होने वाली किसी भी अक्षमता को लागू करना कानून के अनुसार दंडनीय अपराध होगा।"

अब यदि हम अनुच्छेद 17 की व्याख्या करें तो इसमें स्पष्ट लिखा गया है कि अस्पृश्यता यानी कि छुआछूत एक दंडनीय अपराध है। यानी संवैधानिक रूप से छुआछूत को दंडनीय अपराध बनाया गया है। छुआछूत को व्यवहार में लाने पर कौन सा दंड दिया जाएगा यह निश्चित करने की शक्ति संसद के पास है। संसद अलग-अलग कानूनों के जरिए दंड की प्रक्रिया का प्रावधान करती है ताकि छुआछूत को समाज से समाप्त किया जा सके। अब यहां पर प्रश्न यह आता है कि अस्पृश्यता यानी कि छुआछूत आखिर है क्या।

अस्पृश्यता क्या है?

दरअसल, संविधान में अस्पृश्यता शब्द का जिक्र तो है लेकिन इसका स्पष्ट रूप से अर्थ नहीं बताया गया है यानी कि संविधान में अस्पृश्यता शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है और ना ही इसकी कोई परिभाषा हमें किसी अधिनियम या कानून में मिलती है। लेकिन समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसले आए हैं जिनके आधार पर एक अस्पृश्यता की परिभाषा बनती है आइए उसके बारे में जानते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के जरिए जो परिभाषा अस्पृश्यता की बनती है उसके अनुसार संविधान के अनुच्छेद 17 में जिस अस्पृश्यता का जिक्र किया गया है वह जाति आधारित है। यानी कि वह सामाजिक कुप्रथा जो दबे कुचले वर्गों को केवल इस आधार पर नीची दृष्टि से देखती है कि उनका जन्म तथाकथित निम्न जाति में हुआ है। जाति के आधार पर उनसे इस हद तक भेदभाव किया जाता है कि उनको छूना तक भी वर्जित माना जाता है। यानी कि अस्पृश्यता तथाकथित उच्च जाति के लोगों द्वारा तथाकथित निम्न जाति के लोगों को छूने से वर्जित करती है। जाति आधारित इसी अस्पृश्यता को संविधान के अनुच्छेद 17 में वर्जित किया गया है और दंडनीय अपराध बनाया गया है।

अस्पृश्यता से जुड़े कानून

जैसा कि हमने ऊपर जाना कि संविधान संसद को अस्पृश्यता से जुड़े कानून बनाने का अधिकार देता है, उसी अधिकार का प्रयोग करते हुए संसद ने कुछ कानून बनाए हैं जिनमें से दो कानून महत्वपूर्ण है। ये कानून हैं -

1. नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955

संसद द्वारा अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए बनाया गया पहला कानून है "अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955" इसे वर्ष 1976 में संशोधित करके ओर अधिक कठोर बना दिया गया है और इसका नाम बदलकर "नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955" कर दिया गया है। यह अधिनियम अस्पृश्यता से जुड़े सभी अपराधों को गैर-शमनीय बनाता है यानी कि अदालत के बाहर इन मामलों में समझौता नहीं किया जा सकता। यह अधिनियम किसी व्यक्ति को सार्वजनिक पूजा स्थल में प्रवेश करने या पूजा करने से वंचित करने पर, किसी दुकान, सार्वजनिक होटल या मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश करने से वंचित करने पर, अस्पताल में भर्ती करने से या शिक्षा संस्थानों में दाखिला लेने से वंचित करने पर 1 से 2 वर्ष के कारावास का प्रावधान करता है।

2. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

अस्पृश्यता से जुड़ा हुआ दूसरा महत्वपूर्ण कानून है "अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989" इस अधिनियम के अंतर्गत मुकदमे की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान किया गया है। साथ ही इसके अंतर्गत उत्पीड़न शब्द को भी परिभाषित किया गया है जिसमें सिर या मूछ मूँड़ना, चप्पलों की माला पहनाना, या अनुसूचित जाति की महिलाओं को देवदासी बनाने पर दंड का प्रावधान किया गया है। अस्पृश्यता का व्यवहार करने पर इस अधिनियम के अंतर्गत 1 महीने से लेकर 6 महीने तक की सजा, तथा ₹100 से लेकर ₹500 तक के जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है।

इस प्रकार यह मुख्य रूप से दो बड़े कानून है जो अस्पृश्यता से जुड़े हुए हैं, तथा जिनका निर्माण करने की शक्ति अनुच्छेद 17, संसद को देता है।

अस्पृश्यता के उदाहरण

अब बात करते हैं उन कृत्यों की जो अस्पृश्यता से जुड़े कानूनों के दायरे में आते हैं:

1. यदि किसी व्यक्ति को किसी सामाजिक संस्था में प्रवेश करने से रोका जाता है जैसे उसे अस्पताल में भर्ती करने से रोका जाता है, मेडिकल स्टोर में जाने से रोका जाता है, या शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता, तो इसे अस्पृश्यता माना जाएगा।

2. यदि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक उपासना के स्थान जैसे मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, या किसी भी अन्य स्थल पर उपासना या प्रार्थना करने से रोका जाता है तो इसे भी अस्पृश्यता माना जाएगा।

3. यदि किसी व्यक्ति को दुकान, होटल या सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान पर जाने से रोका जाता है या फिर किसी जलाशय, नल, जल के अन्य स्रोत, श्मशान या अन्य सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग करने से प्रतिबंधित किया जाता है, तो भी इसे अस्पृश्यता माना जाएगा।

4. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग के किसी सदस्य के साथ यदि अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है तो यह दंडनीय अपराध होगा।

5. यदि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से छुआछूत को बढ़ावा देता है या समाज में इसे बढ़ावा देने का उपदेश देता है तो इसे भी अस्पृश्यता से जुड़े कानूनों के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा।

6. यदि कोई व्यक्ति इतिहास, दर्शन या धर्म इत्यादि को आधार बनाकर, जाति प्रथा को बनाए रखने की मांग करता है या मानने की बात कहता है या अस्पृश्यता को सही ठहराता है, तो इसे को भी अस्पृश्यता कानूनों के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा।

निष्कर्ष

उम्मीद है आपको Article 17 in Hindi के बारे में पूरी जानकारी मिल गई होगी। भारत के संविधान के रचनाकारों ने भारतीय समाज से हर एक कुप्रथा को समाप्त करने की भरपूर कोशिश की है और अस्पृश्यता सबसे बुरी सामाजिक कुप्रथाओं में से एक है। इसको समाप्त करने के लिए संविधान में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 17 का प्रावधान किया गया है जो अस्पृश्यता को भारतीय समाज से उखाड़ फेंकने हेतु इसे दंडनीय अपराध घोषित करता है। इस प्रकार अनुच्छेद 17 स्पष्ट रूप से अस्पृश्यता से जुड़ा हुआ है और इसकी समाप्ति हेतु हर संभव प्रयास करने की बात कहता है।




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